Word-Meaning: - [१] वानप्रस्थ में, गत मन्त्र के अनुसार (ब्रह्मजायां पुनः दाय) = ब्रह्मजाया, अर्थात् वेदवाणी को फिर से औरों के लिए देकर तथा देवैः - दिव्य गुणों के धारण से (निकिल्बिषं कृत्वी) = अपने जीवन को पापरहित करके और (पृथिव्या:) = इस पृथिवीरूप शरीर को (ऊर्जम्) = बल व प्राणशक्ति को (भक्त्वाय) = सेवन करके (उरुगायम्) = खूब ही गायन के योग्य प्रभु को उपासते ये उपासन करते हैं । [२] संन्यासी के लिए आवश्यक है कि [क] वह अपने जीवन को दिव्य बनाए, पापशून्य उसका जीवन हो। इसके जीवन का ही तो औरों ने अनुकरण करना है। [ख] इसका शरीर स्वस्थ व सबल हो। बिना स्वास्थ्य व सबलता के यह भ्रमण क्या कर पाएगा ? परिव्राजकत्व की सिद्धि के लिए शक्ति आवश्यक है, [ग] इस शक्ति को बनाये रखने के लिए ही यह निरन्तर उस 'उरुगाय' प्रभु का गायन करता है ।
Connotation: - भावार्थ- शुद्ध तथा सशक्त जीवनवाले बनकर हम संन्यस्त हों। उस उरुगाय प्रभु का गायन करते हुए उसी की ओर लोगों को अभिमुख करें। प्रस्तुत सूक्त में सर्वत्र प्रभु की महिमा को देखते हुए ब्रह्मजाया के [वेदवाणी के] आराधन का उल्लेख है प्रसंगवश 'ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ व संन्यासी' के मौलिक कर्त्तव्यों का प्रतिपादन हुआ है। यह 'जमदग्नि' बनता है, खानेवाली जाठराग्निवाला, अर्थात् ठीक पाचनशक्तिवाला, नीरोग तथा 'राम' होता है, रमण करनेवाला, क्रीड़ा की मनोवृत्ति से व्यवहारों को करनेवाला । यह निम्न प्रकार से आराधना करता है-