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अधि॒ यस्त॒स्थौ केश॑वन्ता॒ व्यच॑स्वन्ता॒ न पु॒ष्ट्यै । व॒नोति॒ शिप्रा॑भ्यां शि॒प्रिणी॑वान् ॥

English Transliteration

adhi yas tasthau keśavantā vyacasvantā na puṣṭyai | vanoti śiprābhyāṁ śipriṇīvān ||

Pad Path

अधि॑ । यः । त॒स्थौ । केष॑ऽवन्ता । व्यच॑स्वन्ता । न । पु॒ष्ट्यै । व॒नोति॑ । शिप्रा॑भ्याम् । शि॒प्रिणी॑ऽवान् ॥ १०.१०५.५

Rigveda » Mandal:10» Sukta:105» Mantra:5 | Ashtak:8» Adhyay:5» Varga:26» Mantra:5 | Mandal:10» Anuvak:9» Mantra:5


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यः) जो परमात्मा (व्यचस्वन्ता) व्यक्तीकरण धर्मवाले (केशवन्ता-न) रश्मिवाले सूर्य चन्द्रमा के समान अपने उत्पादन धारण धर्मों को (अधितस्थौ) अधिष्ठित है (पुष्ट्यै) संसारपोषण के लिए (शिप्राभ्याम्) उन व्यापनशीलों से (शिप्रिणीवान्) व्यापी शक्तिवाला संसार में व्याप्त है ॥५॥
Connotation: - जैसे सूर्य और चन्द्रमा प्रकाशवाले पदार्थ वस्तुओं को व्यक्त करते हैं, ऐसे ही परमात्मा के उत्पादन और धारण धर्म संसार को प्रकट करने में निमित्त हैं, परमात्मा व्यापन शक्तिवाला इन दो व्यापन धर्मों को संसार की वृद्धि के लिए अधिकृत कर रहा है ॥५॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

केशवन्ता - व्यचस्वन्ता

Word-Meaning: - [१] (वनोति) = वह शत्रुओं को हिंसित करता है [शत्रून् हिनस्ति ] (यः) = जो (पुष्ट्यै) = शक्तियों के उचित पोषण के लिए (केशवन्ता) = प्रकाश की रश्मियोंवाले (न) = [= च] और (वाचस्वन्ता) = कर्मों के विस्तारवाले इन्द्रियाश्वों को (अधितस्थौ) = अपने द्वारा अधिष्ठित करता है। ज्ञानेन्द्रियाँ प्रकाश की रश्मियोंवाली हैं तो कर्मेन्द्रियाँ कर्मों के विस्तारवाली हैं। जो भी इन्द्रियों को अपने वश में करता है वह इनकी शक्तियों का उचित पोषण कर पाता है। [२] शत्रुओं को वह हिंसित करता है जो (शिप्राभ्याम्) = हनुओं व नासिका द्वारा (शिप्रिणीवान्) = प्रशस्त शिप्रोंवाला होता है। जबड़ों [हनु] के प्रशस्त होने का अभिप्राय यह है कि यह सात्त्विक अन्नों का ही मात्रा में सेवन करता है। नासिका के प्रशस्त होने का अभिप्राय यह है कि यह प्राणायाम का अभ्यासी बनता है। इस प्रकार 'शिप्रिणीवान्' बनकर यह सब काम-क्रोधादि अन्तः शत्रुओं का पराजय कर पाता है ।
Connotation: - भावार्थ - काम-क्रोधादि शत्रुओं का पराजय वह कर पाता है, जो [१] इन्द्रियों का अधिष्ठाता बनता है, [२] सात्त्विक अन्नों का मात्रा में सेवन करता है, [३] प्राणसाधना में प्रवृत्त होता है ।
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यः) यः खलु परमात्मा (व्यचस्वन्ता-केशवन्ता-न) व्यक्तिकरण-धर्मवन्तौ रश्मिवन्तौ सूर्याचन्द्रमसाविव-उत्पादनधारणधर्मौ (अधितस्थौ) अधितिष्ठति (पुष्ट्यै) संसारपोषणाय (शिप्राभ्याम्-शिप्रिणीवान्) ताभ्यां व्यापनशीलाभ्यां व्यापिनीशक्तिमान् संसारं व्याप्नोति ॥५॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Indra who, like the sun of radiant and expansive light, abides and rules over the world of heaven and earth with his potent and pervasive presence for the evolution and progress of life, wins over the contraries and provides everything for the pious and law abiding by both his promotive and punitive powers.