Word-Meaning: - [१] (वनोति) = वह शत्रुओं को हिंसित करता है [शत्रून् हिनस्ति ] (यः) = जो (पुष्ट्यै) = शक्तियों के उचित पोषण के लिए (केशवन्ता) = प्रकाश की रश्मियोंवाले (न) = [= च] और (वाचस्वन्ता) = कर्मों के विस्तारवाले इन्द्रियाश्वों को (अधितस्थौ) = अपने द्वारा अधिष्ठित करता है। ज्ञानेन्द्रियाँ प्रकाश की रश्मियोंवाली हैं तो कर्मेन्द्रियाँ कर्मों के विस्तारवाली हैं। जो भी इन्द्रियों को अपने वश में करता है वह इनकी शक्तियों का उचित पोषण कर पाता है। [२] शत्रुओं को वह हिंसित करता है जो (शिप्राभ्याम्) = हनुओं व नासिका द्वारा (शिप्रिणीवान्) = प्रशस्त शिप्रोंवाला होता है। जबड़ों [हनु] के प्रशस्त होने का अभिप्राय यह है कि यह सात्त्विक अन्नों का ही मात्रा में सेवन करता है। नासिका के प्रशस्त होने का अभिप्राय यह है कि यह प्राणायाम का अभ्यासी बनता है। इस प्रकार 'शिप्रिणीवान्' बनकर यह सब काम-क्रोधादि अन्तः शत्रुओं का पराजय कर पाता है ।
Connotation: - भावार्थ - काम-क्रोधादि शत्रुओं का पराजय वह कर पाता है, जो [१] इन्द्रियों का अधिष्ठाता बनता है, [२] सात्त्विक अन्नों का मात्रा में सेवन करता है, [३] प्राणसाधना में प्रवृत्त होता है ।