Word-Meaning: - [१] (यस्य) = जिस प्रभु के (हरी) = ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियरूप अश्व (सुयुजौ) = उत्तमता से इस शरीररथ में जोते गये हैं, (विव्रता) = जो अश्व विविध व्रतोंवाले हैं, (अर्वन्ता) = जो गतिशील हैं, (अनुशेपा) = जो अनुकूल तत्त्वों को निर्माण करनेवाले हैं [शेप्-पेशस् form] । (उभा रजी न) = दोनों अश्व रञ्जक सूर्य व चन्द्र के समान (केशिना) = प्रकाशमय रश्मियोंवाले हैं । [२] 'अनुशेपा' का अर्थ सायणाचार्य के अनुसार प्रशस्त शक्तिवाले है। इन इन्द्रियाश्वों की निर्बलता के होने पर जीवन- यात्रा की पूर्ति का प्रश्न ही नहीं रह जाता। ये इन्द्रियाश्व शक्तिशाली हों और अपने-अपने कार्यों को उत्तमता से करनेवाले हों। [३] (पतिः) = ऐसे इन्द्रियाश्वों का स्वामी वह प्रभु (दन्) = हमारे लिए इन इन्द्रियाश्वों को प्राप्त कराता हुआ [दन्= प्रयच्छन्] (वेः) = [to pervade or shine] सर्वत्र व्याप्त हो रहा है व दीप्त हो रहा है।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु हमें उन इन्द्रियाश्वों को प्राप्त कराएँ जो उत्तमता से कार्यों में लगनेवाले व सूर्य और चन्द्र के समान दीप्त हों ।