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उप॒ ब्रह्मा॑णि हरिवो॒ हरि॑भ्यां॒ सोम॑स्य याहि पी॒तये॑ सु॒तस्य॑ । इन्द्र॑ त्वा य॒ज्ञः क्षम॑माणमानड्दा॒श्वाँ अ॑स्यध्व॒रस्य॑ प्रके॒तः ॥

English Transliteration

upa brahmāṇi harivo haribhyāṁ somasya yāhi pītaye sutasya | indra tvā yajñaḥ kṣamamāṇam ānaḍ dāśvām̐ asy adhvarasya praketaḥ ||

Pad Path

उप॑ । ब्रह्मा॑णि । ह॒रि॒ऽवः॒ । हरि॑ऽभ्याम् । सोम॑स्य । या॒हि॒ । पी॒तये॑ । सु॒तस्य॑ । इन्द्र॑ । त्वा॒ । य॒ज्ञः । क्षम॑माणम् । आ॒न॒ट् । दा॒श्वान् । अ॒सि॒ । अ॒ध्व॒रस्य॑ । प्र॒ऽके॒तः ॥ १०.१०४.६

Rigveda » Mandal:10» Sukta:104» Mantra:6 | Ashtak:8» Adhyay:5» Varga:25» Mantra:1 | Mandal:10» Anuvak:9» Mantra:6


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (हरिवः) हे दुःखहरणशील गुणवाले (इन्द्र) परमात्मन् ! तू  (सुतस्य) निष्पादित (सोमस्य) उपासनारस के (पीतये) पान के लिए (ब्रह्माणि) वैदिक प्रार्थना और वचनों को (हरिभ्याम्) दुःख हरनेवाले अपने कृपाप्रसाद में से (उप याहि) उपयुक्त कर-उन्हें सफल बना (त्वा क्षममाणम्) तुझ समर्थ होते हुए को (यज्ञः) अध्यात्मयज्ञ  (आनट्) व्याप्त होता है (प्रकेतः) हे प्रेरक ! (अध्वरस्य) अहिंसनीय अध्यात्मयज्ञ के फलरूप अपने आनन्द को (दाश्वान्-असि) देनेवाला है ॥६॥
Connotation: - वैदिक वचनों द्वारा परमात्मा की स्तुति प्रार्थना करनी चाहिए। वह अपने कृपाप्रसाद से स्वीकार करके हररूप में अपना आनन्द प्रदान करता है ॥६॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

ज्ञान प्राप्ति व यज्ञों में लगे रहना

Word-Meaning: - [१] प्रभु जीव से कहते हैं कि हे (हरिवः) = प्रशस्त इन्द्रियाश्वोंवाले ! तू (सुतस्य सोमस्य पीतये) = शरीर में उत्पन्न सोमशक्ति के रक्षण के लिए, अपने अन्दर ही इसके पान के लिए (हरिभ्याम्) = ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रिय रूप अश्वों से (ब्रह्माणि) = ज्ञान की वाणियों के (उपयाहि) = समीप आनेवाला हो । ज्ञान प्राप्ति के लिए उपयुक्त कर्मों में लगने पर ही सोम के रक्षण का सम्भव होता है । अन्यथा मन विलास की ओर जाता है और सोम का विनाश होता है। [२] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष (क्षममाणं त्वा) = [ क्षमूष् सहने, सह मर्षणे] काम-क्रोधादि शत्रुओं को कुचल देनेवाले तुझको (यज्ञः आनट्) = यज्ञ व्याप्त करनेवाला हो। वासनाओं को जीतकर तू यज्ञादि उत्तम कर्मों में व्यापृत रहे । (दाश्वान् असि) = तू खूब देनेवाला, त्याग की वृत्तिवाला है । (अध्वरस्य) = हिंसारहित कर्मों का तू (प्रकेतः) = प्रकृष्ट ज्ञानवाला है । इन अध्वरों में सदा प्रवृत्त होनेवाला है ।
Connotation: - भावार्थ- सोमरक्षण के लिए ज्ञान प्राप्ति के कर्मों में व्यापृत रहना आवश्यक है। उत्तम कर्मों में लगे रहने से ही हम वासनाओं को कुचल पाते हैं।
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (हरिवः-इन्द्र) हे दुःखहरणशील ! गुणवन् ! परमात्मन् ! त्वं (सुतस्य सोमस्य पीतये) निष्पादितस्योपासनारसस्य पानाय (ब्रह्माणि हरिभ्याम्-उप याहि) वैदिकप्रार्थनावचनानि “ब्रह्माणि वेदस्थानि स्तोत्राणि” [ऋ० १।३।६ दयानन्दः] दुःखहरणाभ्यां स्वकीयकृपाप्रसादाभ्यामुपयुङ्क्ष्व सफलानि कुरु (त्वा क्षममाणं यज्ञः-आनट्) त्वां समर्थं सन्तमध्यात्मयज्ञो व्याप्नोति (प्रकेतः) हे प्रेरक ! (अध्वरस्य दाश्वान्-असि) अहिंसनीयस्याध्यात्मयज्ञस्य फलस्य स्वानन्दस्य दाताऽसि ॥६॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Indra, lord of radiant powers, come by the radiations of your divine presence to our songs and acts of adoration to listen and to drink the soma of our love and homage distilled from the heart. May our yajna reach you, lord omnipotent, gracious and forgiving. You are the generous giver, you know the yajna, and you award the fruits of yajna.