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ऊ॒ती श॑चीव॒स्तव॑ वी॒र्ये॑ण॒ वयो॒ दधा॑ना उ॒शिज॑ ऋत॒ज्ञाः । प्र॒जाव॑दिन्द्र॒ मनु॑षो दुरो॒णे त॒स्थुर्गृ॒णन्त॑: सध॒माद्या॑सः ॥

English Transliteration

ūtī śacīvas tava vīryeṇa vayo dadhānā uśija ṛtajñāḥ | prajāvad indra manuṣo duroṇe tasthur gṛṇantaḥ sadhamādyāsaḥ ||

Pad Path

ऊ॒ती । श॒ची॒ऽवः॒ । तव॑ । वी॒र्ये॑ण । वयः॑ । दधा॑नाः । उ॒शिजः॑ । ऋ॒त॒ऽज्ञाः । प्र॒जाऽव॑त् । इ॒न्द्र॒ । मनु॑षः । दु॒रो॒णे । त॒स्थुः । गृ॒णन्तः॑ । स॒ध॒ऽमाद्या॑सः ॥ १०.१०४.४

Rigveda » Mandal:10» Sukta:104» Mantra:4 | Ashtak:8» Adhyay:5» Varga:24» Mantra:4 | Mandal:10» Anuvak:9» Mantra:4


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (शचीवः) हे कर्मवाले सर्वकर्म शक्तिवाले (इन्द्र) परमात्मन् ! (तव) तेरे (ऊती) रक्षण से (वीर्येण) प्रताप से (उशिजः) तुझे चाहनेवाले (ऋतज्ञाः) सत्य के ज्ञाता (मनुषः) स्तुति करनेवाले मनुष्य (वयः-दधानाः) जीवन धारण करते हुए (सधमाद्यासः) परस्पर हर्ष प्रदान करते हुए (गृणन्तः) स्तुति करते हुए (प्रजावत्) पुत्र आदिवाले (दुरोणम्) घर को-में (तस्थुः) ठहरते हैं ॥४॥
Connotation: - परमात्मा की कर्मशक्ति का अनुभव कर तथा सत्य को समझकर जो स्तुति करनेवाले उस परमात्मा को अपनाते हैं, वे तेरी रक्षा और प्रताप को पाकर पुत्रादि से सम्पन्न घर में रहते हैं ॥४॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

उशिक् व ऋतज्ञ

Word-Meaning: - [१] हे (शचीवः) = सर्वशक्तिमन् (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (उशिजः) = मेधावी (ऋतज्ञाः) = ऋत के जाननेवाले, अपने जीवन में ऋत के अनुसार कार्य करनेवाले (मनुषः) = विचारशील लोग (तव) = आपकी (ऊती) = रक्षा के द्वारा आप से रक्षण को प्राप्त करके तथा (वीर्येण) = आपकी शक्ति से, अर्थात् आपसे शक्ति को प्राप्त करके (प्रजावत्) = सब शक्तियों के विकासवाले [प्रजन् - प्रादुर्भाव ] (वयः) = जीवन को (दधानाः) = धारण करते हुए होते हैं । हम मेधावी बनने का प्रयत्न करें, ऋत के अनुसार कार्यों को करनेवाले हों। इससे हमें प्रभु का रक्षण प्राप्त होगा, प्रभु हमारे जीवन को शक्तिशाली बनाएँगे। इस रक्षण व शक्ति से हमारे जीवन का उत्तम विकास होगा। [२] इस उत्तम विकास को प्राप्त करनेवाले उपासक (गृणन्तः) = प्रभु का स्तवन करते हुए (सधमाद्यासः) = प्रभु के साथ आनन्द का अनुभव करते हुए (दुरोणे) = इस शरीर गृह में, जिसमें से कि सब बुराइयों का [दुर्] अपनयन [ओण्] हुआ है, (तस्थुः) = स्थित होते हैं। शरीर में स्थित होने का भाव यह है कि इनकी चित्तवृत्ति इधर-उधर भटकती नहीं, ये सदा औरों को ही नहीं देखते रहते । मनोनिरोध के द्वारा अन्दर ही स्थित होते हैं ।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु के रक्षण व शक्तिदान से हमारा जीवन उत्कृष्ट बनता है। हम मेधावी व ऋत के पालन करनेवाले बनकर इस शरीर गृह में स्तवन करते हुए व प्रभु के साथ आनन्द को अनुभव करते हुए स्थित होते हैं ।
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (शचीवः-इन्द्र) हे कर्मवन् परमात्मन् ! (तव ऊती वीर्येण) तव रक्षणेन प्रतापेन च (उशिजः-ऋतज्ञाः-मनुषः) त्वां कामयमानाः सत्यज्ञाः स्तोतारो मनुष्याः (वयः-दधानाः) जीवनं धारयन्तः (सधमाद्यासः-गृणन्तः) परस्परं हर्षं प्रयच्छन्तः स्तुवन्तश्च (प्रजावत् दुरोणं तस्थुः) पुत्रादियुक्तं गृहम् “दुरोणं गृहनाम” [निघ० ३।४] तिष्ठन्ति ॥४॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Indra, lord of holy actions of creation, sustenance and finale, under your protection by your power and generosity, ardent devotees bearing food, good health and long age, knowing and pursuing the laws of truth and yajnic living, blest with good progeny and noble humanity, abide in their yajnic home, singing, rejoicing and celebrating your generosity.