उत्कृष्ट प्रयत्न- प्रशंसनीय श्रम
Word-Meaning: - 'नर' शब्द की भावना 'न- रम्' इस संसार में ही न रम जाने की है। संसार में रहते हुए भी इसमें न फँसना - आवश्यकता से अधिक धन की भावना को अपने में दृढमूल न होने देनेवाला मनुष्य ही 'नर' है। ये लोग ही संसार में आकर आध्यात्ममार्ग में भी आगे बढ़ा करते हैं । मन्त्र में कहते हैं कि नरः=अपने को आगे और आगे ले चलनेवाले मनुष्यो ! [नृ नये] (प्रेत) = आगे बढ़ो, यह धन तुम्हारे जीवन यात्रा के मार्ग में रुकावट बनकर न खड़ा हो जाए। (जयत) = इस विघ्न को जीत लो, बस यही तो सबसे बड़ा विघ्न है। इसका मोहक स्वरूप यह है कि "इसके बिना तुम्हारी संसार - यात्रा नहीं चलेगी, नमक भी तो न मिल सकेगा। कोई बन्धु-बान्धव तुम्हें पूछेगा नहीं, समाज में तुम्हारी प्रतिष्ठा न होगी", परन्तु वास्तविकता इससे भिन्न है। धन सीमितरूप में सहायक है, लोभ को जन्म देकर यह महान् विघ्न बन जाता है। वेद कहता है कि (इन्द्रः) = वह सब ऐश्वर्यों का स्वामी प्रभु (वः) = तुम्हें (शर्म यच्छतु) = शरण दे। धन ने क्या शरण देनी। धनों के स्वामी के चरणों की शरण प्राप्त हो जाने पर इस तुच्छ धन का महत्त्व ही क्या रह जाता है ? जब मनुष्य धन का दास नहीं रहता, तब उसे कभी भी टेढ़े-मेढ़े साधनों से नहीं कमाता । वेद का यही आदेश है कि (वः) = तुम्हारे (बाहवः) = प्रयत्न [बाह्र प्रयत्ने] (उग्राः सन्तु) = उत्कृष्ट हों । वस्तुतः धन का दास न रहने पर मनुष्य कभी भी अन्याय्य मार्ग से इसका सञ्चय नहीं करता । वेद कहता है कि प्रभु की शरण पकड़ो - उत्कृष्ट श्रम करो (यथा) = जिससे तुम (अनाधृष्याः) = लोभादि से न कुचले जानेवाले (असथ) = हो जाओ। मनुष्य का यही ध्येय होना चाहिए कि वह कभी अन्याय से अर्थ का संचय करना न चाहे । यही उन्नति का मार्ग है ।
Connotation: - भावार्थ- हम आगे पढ़ें, लोभ को जीतें, प्रभु की शरण ग्रहण करें, उत्कृष्ट श्रम करते हुए ही धनार्जन करें।