Word-Meaning: - [१] (अष्टावी) = चाबुकवाला, व्रतरूप प्रतोद से इन्द्रियरूप गौवों को हाँकनेवाला, (कपर्दी) = [क- पर्+द] सुख की पूर्ति को देनेवाला, अर्थात् अधिक से अधिक औरों के जीवनों को सुखी बनानेवाला व्यक्ति (शुनम्) = उस सुखस्वरूप प्रभु की ओर (व्यचरत्) = विशेषरूप से चलनेवाला होता है। प्रभु को प्राप्त करनेवाला [क] इन्द्रियों को व्रतों के बन्धन में बाँधना है तथा [ख] औरों के लिए सुख को प्राप्त कराने का प्रयत्न करता है । [२] [ग] यह दारु - इस अन्ततः विदीर्ण करने योग्य शरीर को (दारु) = 'दृ', शरीर = शृ] (वरत्रायाम्) = व्रतरज्जु में (आनह्यमानः) = समन्तात् बाँधनेवाला होता है । इन व्रतों के बन्धनों के बिना उच्छृंखल क्रियाओंवाला यह शरीर उन्नति का साधन नहीं होता । [३] [घ] यह प्रभु-भक्त (बहवे जनाय) = बहुत लोगों के लिए (नृम्णानि कृण्वन्) = धनों व सुखों को करनेवाला होता है । धनों का उपभोग स्वयं अकेले में नहीं कर लेता, यह औरों के साथ बाँट करके ही धनों का उपभोग करता है । यह इस बात को अच्छी तरह समझता है कि 'केवलाघो भवति केवलादी' । [४] [ङ] (गाः पस्पशान:) = यह ज्ञान की वाणियो का देखनेवाला होता है और (तविषीः) = बलों को (अधत्त) = धारण करता है। ज्ञान और बल का अपने जीवन में समन्वय करके चलता है ।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु-भक्त के लक्षण निम्न हैं- [क] जितेन्द्रियता, [ख] औरों को सुखी करने का प्रयत्न, [ग] शरीर को व्रत बन्धनों में बाँधना, [घ] सबके साथ बाँट करके खाना, [ङ] स्वाध्यायशीलता, [च] शक्ति सम्पन्न | - धैवतः ॥