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उत्स्म॒ वातो॑ वहति॒ वासो॑ऽस्या॒ अधि॑रथं॒ यदज॑यत्स॒हस्र॑म् । र॒थीर॑भून्मुद्ग॒लानी॒ गवि॑ष्टौ॒ भरे॑ कृ॒तं व्य॑चेदिन्द्रसे॒ना ॥

English Transliteration

ut sma vāto vahati vāso syā adhirathaṁ yad ajayat sahasram | rathīr abhūn mudgalānī gaviṣṭau bhare kṛtaṁ vy aced indrasenā ||

Pad Path

उत् । स्म॒ । वातः॑ । व॒ह॒ति॒ । वासः॑ । अ॒स्याः॒ । अधि॑ऽरथम् । यत् । अज॑यत् । स॒हस्र॑म् । र॒थीः । अ॒भू॒त् । मु॒द्ग॒लानी॑ । गवि॑ष्टौ । भरे॑ । कृ॒तम् । वि । अ॒चे॒त् । इ॒न्द्र॒ऽसे॒ना ॥ १०.१०२.२

Rigveda » Mandal:10» Sukta:102» Mantra:2 | Ashtak:8» Adhyay:5» Varga:20» Mantra:2 | Mandal:10» Anuvak:9» Mantra:2


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यत्) जब (इन्द्रसेना) विद्युत्तरङ्गधारा (मुद्गलानी) मुद्गलपक्षी के आकारवाली मुद्गलपत्नी जैसी यन्त्रकीली (गविष्टौ) वृषभगति में (रथीः) नेत्री-ले जानेवाली होती है, तो (भरे) संग्राम में-संग्राम के निमित्त (कृतम्) कार्यक्रम को (वि अचेत्) विशेषरूप से व्यक्त करती है, तब (अधिरथम्) रथ के अधीन यन्त्रयान में हुआ (वातः) वायु (अस्याः) इसके (वासः) आच्छादनस्थान को (उद्वहति स्म) उत्प्रेरित करता है, (सहस्रम्-अजयत्) तब शत्रु के सहस्र बल को जीतता है ॥२॥
Connotation: - सांग्रामिक रथयान में विद्युत् की तरङ्गशक्ति काम करती है, जो एक यन्त्र की कीली में निहित होती है, उससे यन्त्र संग्राम में गति करता है, तब यान में स्थित वायु उसके आच्छादनपात्र को उभार देता है, तो शत्रु के बहुत बलों को प्रभावित करता है, जीतता है ॥२॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

मुद्गलानी द्वारा रथ-संचालन

Word-Meaning: - [१] जीव 'मुगल' है, तो उसकी पत्नीरूप बुद्धि 'मुद्गलानी' है । आत्मा शरीर रथ का स्वामी है, तो बुद्धि इस रथ का सारथि है । (यत्) = जब यह बुद्धि (अधिरथम्) = इस रथ में स्थित होकर (सहस्रम्) = शतशः वासनाओं को (अजयत्) = जीतती है तो (वातः) = प्राण (अस्याः) = इसके (वास:) = आच्छादन व आवरणभूत वासनारूप वस्त्र को (उद्वहति स्म) = दूर करता है। प्राणसाधना से काम का विनाश होता है। यह काम ही बुद्धि पर परदा-सा पड़ा हुआ होता है। इस परदे के हट जाने से ज्ञान चमक उठता है । [२] इस ज्ञान की दीप्ति में ही प्रभु का आभास मिलता है। सो (गविष्टौ) = उस प्रभु के गवेषण में (मुद्गलानी) = ओषधि वनस्पतियों का सेवन करनेवाले जीव की पत्नी रूप बुद्धि (रथीः) = शरीर रथ की संचालिका (अभूत्) = होती है । [३] जब बुद्धि प्रभु के अन्वेषण के लिए प्रवृत्त होती है तो (इन्द्रसेना) = इस जितेन्द्रिय पुरुष की (सेना) = अर्थात् इन्द्रियाँ प्राण, मन व बुद्धि (भरे) = [= इस अध्यात्म-संग्राम में (कृतं व्यचेत्) = सफलता से प्राप्त होनेवाले फल का चयन करे, अर्थात् विजयी बने ।
Connotation: - भावार्थ- -बुद्धि प्रभु-दर्शन में प्रवृत्त होती है, तो हमारी इन्द्रियाँ, मन व प्राण वासनाओं का पराजय करनेवाले होते हैं।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यत्) यदा (इन्द्रसेना मुद्गलानी) विद्युत्तरङ्गधारा मुद्गलस्य मदङ्गिलस्य मुद्गलपक्षिविशेषाकृतिमतो यन्त्रस्य “मुद्गलः पक्षिविशेषः” [शब्दकल्पद्रुमः] पत्नीव-काचित् यान्त्रिकी कीली (गविष्टौ रथीः-अभूत्) गोवृषभस्तस्येष्टौ गत्यां रथी नेत्री भवति (भरे कृतं वि अचेत्) सङ्ग्रामे-सङ्ग्रामनिमित्तम् ‘निमित्तसप्तमी’ कृतं कार्यक्रमं विचिनोति व्यक्तं करोति, तदा (अधिरथं वातः) रथे तद्यन्त्रयाने जातो वायुः (अस्याः-वासः-उत् वहति स्म) अस्या आच्छादनस्थानमुत्प्रेरयति (सहस्रम्-अजयत्) शत्रोरसंख्यबलं जयति ॥२॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - The wind raises and unfurls the banner of this force of Indra on the chariot which wins over thousands. The mace of the waxing force of Indra rides the chariot as commander in the heat of battle, the army moves and extends its exploits (against malice, hate and enmity).