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प्री॒णी॒ताश्वा॑न्हि॒तं ज॑याथ स्वस्ति॒वाहं॒ रथ॒मित्कृ॑णुध्वम् । द्रोणा॑हावमव॒तमश्म॑चक्र॒मंस॑त्रकोशं सिञ्चता नृ॒पाण॑म् ॥

English Transliteration

prīṇītāśvān hitaṁ jayātha svastivāhaṁ ratham it kṛṇudhvam | droṇāhāvam avatam aśmacakram aṁsatrakośaṁ siñcatā nṛpāṇam ||

Pad Path

प्री॒णी॒त । अश्वा॑न् । हि॒तम् । ज॒या॒थ॒ । स्व॒स्ति॒ऽवाह॑म् । रथ॑म् । इत् । कृ॒णु॒ध्व॒म् । द्रोण॑ऽआहावम् । अ॒व॒तम् । अश्म॑ऽचक्रम् । अंस॑त्रऽकोशम् । सि॒ञ्च॒त॒ । नृ॒ऽपान॑म् ॥ १०.१०१.७

Rigveda » Mandal:10» Sukta:101» Mantra:7 | Ashtak:8» Adhyay:5» Varga:19» Mantra:1 | Mandal:10» Anuvak:9» Mantra:7


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (अश्वान्) इस प्रकार घास आदि की उत्पत्ति हो जाने पर घोड़े आदि को (प्रीणीत) तृप्त करो (हितं जयाथ) हित अन्न को प्राप्त करो (स्वस्तिवाहम्) इस प्रकार घास अन्न से समृद्ध होते हुए कल्याणवाहक (रथम्-इत्) रथ को अवश्य (कृणुध्वम्) करो-बनाओ (द्रोणाहावम्) काष्ठमय जलपात्रवाले (अश्मचक्रम्) व्याप्त चक्रवाले-घूमते हुए चक्र से युक्त (अवतम्) कुएँ को (अंसत्रम्) गति करते हुए यन्त्रों के रक्षक (कोशम्) गुप्त घर को बनाओ (नृपानम्) कृषि के नेताओं-कृषकजनों की रक्षा जिससे हो, ऐसे खेत को (सिञ्चत) सींचो-प्रवृद्ध करो ॥७॥ 
Connotation: - घास आदि से घोड़े आदि पशुओं को तृप्त करना-काष्ठमय पात्रवाले चक्र या व्याप्त गतिवाले चक्र से युक्त कुएँ को बनाना, गतिमय चक्रयन्त्रों से गुप्त स्थान को बनाना खेत सींचना चाहिये ॥७॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

स्वस्मिवाट् रथ

Word-Meaning: - [१] (अश्वान् प्रीणीत) = इन्द्रियाश्वों को प्रीणित करो। नैर्मल्य के द्वारा इन्हें प्रसन्नतायुक्त करो । (हितं जयाथ) = इन प्रसन्न इन्द्रियों के द्वारा हितकर वस्तु का विजय करो। (रथम्) = इस शरीर - रथ को (इत्) = निश्चय से (स्वस्तिवाहम्) = कल्याण की ओर ले जानेवाला (कृणुध्वम्) = करो। इन्द्रियाँ निर्मल व सबल हों, शरीर स्वस्थ हो । स्वस्थ इन्द्रियों व स्वस्थ शरीर से हम हित व कल्याण को सिद्ध करें। [२] हे उपासको ! तुम उस प्रभु को (सिञ्चता) = अपने हृदयक्षेत्र में सिक्त करो जो प्रभु (द्रोणाहावम्) = प्रेरणा [द्रु गतौ] देनेवाली पुकारवाले हैं, जिनके नामों का स्मरण हमें अपने कर्त्तव्यों का स्मरण कराता है । (अवतम्) = जो रक्षण करनेवाले हैं। वस्तुतः निरन्तर कर्त्तव्यों का स्मरण कराते हुए वे प्रभु हमारा रक्षण करते हैं । [२] (अश्मचक्रम्) = प्रभु स्मरण से हमारा यह शरीर चक्र पत्थर के समान दृढ़ बनता है। (अंसत्र कोशम्) = [अंसत्राणां कोशा] वे प्रभु कवचों के कोश हैं। अर्था प्रभु प्रत्येक प्राणी के लिए कवच बनते हैं और उसे रक्षित करनेवाले होते हैं। (नृपाणम्) = इस प्रकार वे प्रभु नरों के रक्षक हैं, आगे बढ़ने की वृत्तिवाले पुरुष प्रभु से रक्षणीय होते हैं। आलसियों को प्रभु-रक्षण नहीं प्राप्त होता ।
Connotation: - भावार्थ- हम इन्द्रियों को शक्तिशाली बनाएँ, शरीर-रथ को कल्याण के मार्ग पर ले चलें । प्रभु को हृदयक्षेत्र में सिक्त करने का प्रयत्न करें।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (अश्वान् प्रीणीत) एवं घासादीनामुत्पत्तौ सत्यामश्वादीन् तर्पयत (हितं जयाथ) हितकरमन्नं लभध्वम् (स्वस्तिवाहं रथम्-इत्-कृणुध्वम्) एवं यवसान्नसमृद्धाः सन्तः कल्याणवाहकं रथमपि कुरुत (द्रोणाहावम्-अवतम्-अश्मचक्रम्) काष्ठमयं जलपात्रवन्तं तथा व्याप्तचक्रं भ्रमच्चक्रवन्तं कूपम् (अंसत्र-कोशम्) “अंसान् गत्यादीन् रक्षतस्तौ” [ऋ० ४।३४।९ दयानन्दः] रक्षति यस्मिन् तथाभूतं कोशगृहं (नृपानम्) नॄणां नराणां कृषिनेतॄणां रक्षणस्थानञ्च तथाभूतं क्षेत्रं (सिञ्चत) जलं दत्त्वा सम्पन्नं कुरुत-प्रवर्धयत ॥७॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Keep the horses well fed. Realise your common interests. Design, make and maintain the chariot that brings you comfort, peace, prosperity and well being. Protect and maintain the big water vessel. Maintain the rain cycle and keep the supply line on by drinking water tanks and wells for human consumption and irrigation.