Word-Meaning: - [१] (अश्वान् प्रीणीत) = इन्द्रियाश्वों को प्रीणित करो। नैर्मल्य के द्वारा इन्हें प्रसन्नतायुक्त करो । (हितं जयाथ) = इन प्रसन्न इन्द्रियों के द्वारा हितकर वस्तु का विजय करो। (रथम्) = इस शरीर - रथ को (इत्) = निश्चय से (स्वस्तिवाहम्) = कल्याण की ओर ले जानेवाला (कृणुध्वम्) = करो। इन्द्रियाँ निर्मल व सबल हों, शरीर स्वस्थ हो । स्वस्थ इन्द्रियों व स्वस्थ शरीर से हम हित व कल्याण को सिद्ध करें। [२] हे उपासको ! तुम उस प्रभु को (सिञ्चता) = अपने हृदयक्षेत्र में सिक्त करो जो प्रभु (द्रोणाहावम्) = प्रेरणा [द्रु गतौ] देनेवाली पुकारवाले हैं, जिनके नामों का स्मरण हमें अपने कर्त्तव्यों का स्मरण कराता है । (अवतम्) = जो रक्षण करनेवाले हैं। वस्तुतः निरन्तर कर्त्तव्यों का स्मरण कराते हुए वे प्रभु हमारा रक्षण करते हैं । [२] (अश्मचक्रम्) = प्रभु स्मरण से हमारा यह शरीर चक्र पत्थर के समान दृढ़ बनता है। (अंसत्र कोशम्) = [अंसत्राणां कोशा] वे प्रभु कवचों के कोश हैं। अर्था प्रभु प्रत्येक प्राणी के लिए कवच बनते हैं और उसे रक्षित करनेवाले होते हैं। (नृपाणम्) = इस प्रकार वे प्रभु नरों के रक्षक हैं, आगे बढ़ने की वृत्तिवाले पुरुष प्रभु से रक्षणीय होते हैं। आलसियों को प्रभु-रक्षण नहीं प्राप्त होता ।
Connotation: - भावार्थ- हम इन्द्रियों को शक्तिशाली बनाएँ, शरीर-रथ को कल्याण के मार्ग पर ले चलें । प्रभु को हृदयक्षेत्र में सिक्त करने का प्रयत्न करें।