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निरा॑हा॒वान्कृ॑णोतन॒ सं व॑र॒त्रा द॑धातन । सि॒ञ्चाम॑हा अव॒तमु॒द्रिणं॑ व॒यं सु॒षेक॒मनु॑पक्षितम् ॥

English Transliteration

nir āhāvān kṛṇotana saṁ varatrā dadhātana | siñcāmahā avatam udriṇaṁ vayaṁ suṣekam anupakṣitam ||

Pad Path

निः । आ॒ऽहा॒वान् । कृ॒णो॒त॒न॒ । सम् । व॒र॒त्राः । द॒धा॒त॒न॒ । सि॒ञ्चाम॑है । अ॒व॒तम् । उ॒द्रिण॑म् । व॒यम् । सु॒ऽसेक॑म् । अनु॑पऽक्षितम् ॥ १०.१०१.५

Rigveda » Mandal:10» Sukta:101» Mantra:5 | Ashtak:8» Adhyay:5» Varga:18» Mantra:5 | Mandal:10» Anuvak:9» Mantra:5


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - बुद्धिमान् जन उपदेश करते हैं कि हे कृषकों किसानों ! (आहावान्-निः-कृणोतन) जलस्थानों का निर्माण करो-बनाओ (वरत्राः) आवरणकारी भित्तियों को (सम्-दधातन) बाँधो, जिससे कि (वयम्) हम (उद्रिणम्) स्वयं जल को ऊपर फैंकनेवाले (सुषेकम्) अच्छे सींचनेवाले (अनुपक्षितम्) क्षीण न होनेवाले (अवतम्) कुए को (सिञ्चामहै) सींचें ॥५॥
Connotation: - खेत को सींचने के लिए जलस्थानों को बनाना, उनके जल को रोकने के लिए चारो ओर बाँध बाँधना और ऐसे जलकूप बनाना, जिनका जल ऊपर आता जाये और क्षीण न हो, ऐसे साधनों से खेत को सींचना चाहिये ॥५॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

प्रभु स्मरण व व्रत-धारण

Word-Meaning: - [१] (आहावान्) = प्रभु की पुकारों को, आराधनाओं को (निः कृणोतन) = निश्चय से करनेवाले बनो । (वरत्रा) = व्रत की रज्जुओं को (संदधातन) = धारण करो, अर्थात् व्रतों के बन्धनों में अपने को बाँधो । [क] प्रभु का स्मरण करें, [ख] जीवन को व्रती बनाएँ। [२] (वयम्) = हम उस प्रभु को (सिञ्चामहा) = अपने में सिक्त करें, जो (अवतम्) = हम सबके रक्षक हैं, (उद्रिणम्) = ज्ञान जल से परिपूर्ण हैं, (सुषेकम्) = हमें आनन्द से सिक्त करनेवाले हैं, (अनुपक्षितम्) = कभी क्षीण व नष्ट होनेवाले नहीं है।
Connotation: - भावार्थ - जीवन का आनन्द इसी में है कि हम प्रभु स्मरणपूर्वक व्रतों का पालन करनेवाले बनें।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (आहावान्-निः-कृणोतन) एते धीराः धीमन्तो ब्रुवन्ति हे कृषकाः ! यूयम्-आहावान् निपानानि जलस्थानानि “निपानमाहावः” [अष्टा० ३।३।७४] कुरुत सम्पादयत (वरत्राः-सम्-दधातन) “वृणोत्युदकं यया सा वरत्रा वृञश्चित्-अत्रन्” [उणादि० ३।१०७] आवरणीः-भित्तिः “बान्ध” इति भाषायां प्रसिद्धम्, ता आवरणीर्भित्तीः सन्धत्त, यतः (वयम्-उद्रिणं सुसेकम्) वयं खलूत्क्षेपणकारिणं स्वयं जल-क्षेपणकं सुसेक्तारम् (अनुपक्षितम्-अवतम्-सिञ्चामहै) उपक्षयरहितं कूपम् “अवतं कूपनाम” [निघ० ३।२३] सिञ्चामः ॥५॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Develop the sources of water, manage the connections, and let us replenish and maintain the full water sources inexhaustibly good for the purpose of consumption and irrigation.