Word-Meaning: - [१] हे प्रभो! (ते भानुः) = आपका प्रकाश (चित्र:) = अद्भुत है अथवा (चायनीय) = पूजनीय है । (क्रतुप्राः) = यह ज्ञान हमारे सब यज्ञात्मक कर्मों का पूरक है। अतएव (अभिष्टिः) = यह ज्ञान अभ्येषणीय- चाहने योग्य है। [२] आपके (स्पृधः) = [ स्पृध् संग्रामनाम नि० २।१७] संग्राम (सन्ति) = हैं, जो (जरणिप्राः) = स्तोताओं का पूरण करनेवाले हैं और (अधृष्टाः) = शत्रुओं से धर्षण के योग्य नहीं है । हृदयस्थली में काम, क्रोध, लोभ आदि के साथ चलनेवाले संग्राम अध्यात्म संग्राम हैं। एक स्तोता प्रभु स्मरण के द्वारा प्रभु को ही इन से लड़ने के लिए आगे करता है। सो ये संग्राम प्रभु के संग्राम हो जाते हैं। प्रभु की शक्ति से कामादि शत्रुओं का धर्षण होता है । ये काम, क्रोधादि शत्रु प्रभु के स्तोता का धर्षण नहीं कर पाते । [३] यह (दुवस्युः) = प्रभु की परिचर्या करनेवाला (रजिष्ठया) = [ऋजुतम नि० ८।१९ ] अत्यन्त सरलता से युक्त (रज्या) = [रंज् to worship] उपासना के द्वारा (पश्वः) = उस सर्वद्रष्टा प्रभु की (गोः) = सर्वार्थ प्रतिपादि का ज्ञान की अधिष्ठानभूता वेदवाणी के [गमयति अर्थान्] (अग्रम्) = अग्रभाग तक, शिखर तक (परि आ तुतूर्षति) = सर्वथा त्वरा से पहुँचनेवाला होता है। प्रभु की उपासना से निर्मल जीवनवाला होकर, कामरूप आवरण को दूर करके दीप्त ज्ञानवाला बनता है।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु का प्रकाश अद्भुत है । उपासक प्रभु की उपासना से कामरूप आवरण को विनष्ट करके इस प्रकाश को प्राप्त करता है यह उपासक ज्ञान की वाणी के शिखर [अग्रभाग] तक पहुँचता है । इस सूक्त की केन्द्रीभूत भावना यही है कि प्रभु की उपासना से काम को जीतकर हम सोम का रक्षण करें। इससे तीव्र बुद्धि बनकर हम ज्ञान के शिखर पर पहुँचनेवाले हों। यह ज्ञान के शिखर पहुँचनेवाला ही 'बुध' सोम का रक्षण करके ही यह बुध बन पाया है सो 'सौम्य ' है । अगले सूक्त का ऋषि 'बुधः सौम्यः ' ही है। ज्ञान प्राप्ति के कारण यह सौम्य व विनीत है। इसकी प्रार्थना का स्वरूप निम्न है-