Word-Meaning: - [१] (यमस्य) = तुझ यम का (काम:) = प्रेम [= मोह] (यम्यं मा) = मुझ यमी के प्रति (आगन्) = प्राप्त हो । समाने (योनौ) = समान ही घर में (सहशेय्याय) = साथ-साथ निवास के लिये कामना हो । अर्थात् हमें अलग-अलग न होना पड़े। [२] यह ठीक है कि प्रभु ने कुछ ऐसी व्यवस्था की है समान रुधिर मिलकर, कुछ गुणों में नवीनता उत्पन्न न होकर, ह्रास ही होता है। इसलिए मनुष्य को दूर- दूर ही सम्बन्ध करने पड़ते हैं और इस प्रकार भिन्न-भिन्न घर परस्पर गुंथ जाते हैं । यदि ऐसा न होता तो मोहवश व्यक्ति एक ही घर में सीमित हो जाते, समाज की भावना का पोषण ही न हो पाता। भाई बहिन का सम्बन्ध यदि उन्हें एक ही घर में सीमित कर देता है तो एक स्थान पर बहिन का सम्बन्ध होना तथा दूसरे स्थान पर भाई का सम्बन्ध होना कमजकम तीन घरों को मिला देता है । [३] पर यहाँ यमी यम की परीक्षा लेती हुई उसे प्रेम के नाते प्रेरित करती है कि हे यम ! तूम मेरी कामना कर। और मैं (जाया इव) = पत्नी की तरह (पत्ये) = पति के रूप में तेरे लिये (तन्वं) = अपने शरीर को (रिरिच्याम्) = [विविच्यां, प्रकाशयेयम्] प्रकाशित करूँ । अर्थात् हम परस्पर पति-पत्नी के रूप में हों । (चित्) = और निश्चय से (विवृहेव) = हम धर्म-अर्थ व काम रूप पुरुषार्थों के लिये उद्योग करें । रथ्या (चक्रा इव) = जैसे रथ के दो पहिये रथ को उद्दिष्ट स्थल पर पहुँचानेवाले होते हैं उसी प्रकार हम पति-पत्नी इस जीवन रथ के दो पहियों के समान हों और जीवन को सफल बनायें ।
Connotation: - भावार्थ - हे यम ! क्या तुझे मेरे प्रति प्रेम नहीं? हमारा आपस में प्रेम स्वाभाविक है हम पति-पत्नी बनकर धर्म, अर्थ, काम आदि पुरुषार्थों को सिद्ध करते हुए जीवन को सफल करें।