परस्पर प्रेम व सुभद्रा संवित्
Word-Meaning: - [१] यम भी बहिन के लिये मंगल कामना करता हुआ कहता है कि (यमि) = संयत जीवन वाली (त्वम्) = तू (उ) = निश्चय से (अन्यम्) = अपने से विलक्षण रुधिरादि धातुओं वाले पुरुष को ही परिष्वजाते आलिंगन कर तथा (त्वां उ) = तुझे भी (अन्यः) = तेरे से विलक्षण धातुओं वाला पुरुष ही (सुपरिष्वजाते) = सम्यक् आलिंगन करे। उसी प्रकार (इव) = जैसे कि (लिबुज) = बेल (वृक्षम्) = वृक्ष को आलिंगन करती है । [२] (त्वम्) = तू (तस्य मनः) = उसके मन को (वा) = निश्चय से (इच्छा) = चाहनेवाली बन, (वा स) = और वह भी (तव) = तेरे मन को चाहनेवाला हो। तुम्हारा परस्पर प्रेम हो, तुम एक दूसरे के भावों को आदृत करनेवाले होवो, तुम्हारा परस्पर ऐकमत्य हो । [३] (अधा) = और अब, इस प्रकार पति के साथ प्रेम व ऐकमत्य वाली होकर (सुभद्रां संविदम्) = कल्याणी बुद्धि को [understanding] अथवा परस्परैक्यमतिता को [Agreement] कृणुष्व तू करनेवाली हो । अर्थात् तुम्हारे घर में शुभ विचार व सामञ्जस्य ही बना रहे ।
Connotation: - भावार्थ- पति पत्नी का परस्पर प्रेम हो । घर में सदा 'सुभद्रा-संवित्' बनी रहे । इस सम्पूर्ण सूक्त में यमी यम की परीक्षा लेती हुई उसे समीप सम्बन्ध के लिये प्रेरित करती है । परन्तु यम उस परीक्षा में उत्तीर्ण होकर दूर सम्बन्धों के महत्त्व को सुव्यक्त करता है। और प्रसंगवश 'घर को किस प्रकार सुन्दर बनाना चाहिए' इस बात का भी संकेत करता है। इस सुन्दर घर में 'किस प्रकार यज्ञादि में जीवन को बिताना चाहिए' इसका निर्देश करते हैं ।