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अ॒न्यमू॒ षु त्वं य॑म्य॒न्य उ॒ त्वां परि॑ ष्वजाते॒ लिबु॑जेव वृ॒क्षम् । तस्य॑ वा॒ त्वं मन॑ इ॒च्छा स वा॒ तवाधा॑ कृणुष्व सं॒विदं॒ सुभ॑द्राम् ॥

English Transliteration

anyam ū ṣu tvaṁ yamy anya u tvām pari ṣvajāte libujeva vṛkṣam | tasya vā tvam mana icchā sa vā tavādhā kṛṇuṣva saṁvidaṁ subhadrām ||

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Pad Path

अ॒न्यम् । ऊँ॒ इति॑ । सु । त्वम् । य॒मि॒ । अ॒न्यः । ऊँ॒ इति॑ । त्वाम् । परि॑ । स्व॒जा॒ते॒ । लिबु॑जाऽइव । वृ॒क्षम् । तस्य॑ । वा॒ । त्वम् । मनः॑ । इ॒च्छा । सः । वा॒ । तव॑ । अध॑ । कृ॒णु॒ष्व॒ । स॒म्ऽविद॑म् । सुऽभ॑द्राम् ॥ १०.१०.१४

Rigveda » Mandal:10» Sukta:10» Mantra:14 | Ashtak:7» Adhyay:6» Varga:8» Mantra:4 | Mandal:10» Anuvak:1» Mantra:14


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यमि) हे रात्रे ! (सु) हाँ तेरा पूर्वोक्त वचन ठीक है, अतः (त्वम्) तू भी (अन्यम् उ) अन्य पुरुष को (लिबुजा-इव वृक्षम्) लता की नाई वृक्ष को आलिङ्गन कर तथा (अन्य उ) वह अन्य पुरुष भी (त्वाम्) तुझको (परिष्वजाते) आलिङ्गन करे (त्वं वा) और तू (तस्य) उस पुरुष के (मनः) मन को (इच्छ) चाह (सः वा) और वह पुरुष (तव) तेरे मन की चाह करे (अधा) इस के अनन्तर (संविदम्) नियोगरूप प्रतिज्ञा को (सुभद्राम्) अच्छे कल्याणयुक्त अर्थात् सुसन्तानवाली (कृणुष्व) बना ॥१४॥
Connotation: - सन्तानोपत्ति में असमर्थ होते हुए भी यदि वैराग्यवशात् या परोपकारकार्यवशात् नियोग न करें और संयम से रहें, तो यह अनुचित नहीं, अपितु अधिक अच्छा है ॥१४॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

परस्पर प्रेम व सुभद्रा संवित्

Word-Meaning: - [१] यम भी बहिन के लिये मंगल कामना करता हुआ कहता है कि (यमि) = संयत जीवन वाली (त्वम्) = तू (उ) = निश्चय से (अन्यम्) = अपने से विलक्षण रुधिरादि धातुओं वाले पुरुष को ही परिष्वजाते आलिंगन कर तथा (त्वां उ) = तुझे भी (अन्यः) = तेरे से विलक्षण धातुओं वाला पुरुष ही (सुपरिष्वजाते) = सम्यक् आलिंगन करे। उसी प्रकार (इव) = जैसे कि (लिबुज) = बेल (वृक्षम्) = वृक्ष को आलिंगन करती है । [२] (त्वम्) = तू (तस्य मनः) = उसके मन को (वा) = निश्चय से (इच्छा) = चाहनेवाली बन, (वा स) = और वह भी (तव) = तेरे मन को चाहनेवाला हो। तुम्हारा परस्पर प्रेम हो, तुम एक दूसरे के भावों को आदृत करनेवाले होवो, तुम्हारा परस्पर ऐकमत्य हो । [३] (अधा) = और अब, इस प्रकार पति के साथ प्रेम व ऐकमत्य वाली होकर (सुभद्रां संविदम्) = कल्याणी बुद्धि को [understanding] अथवा परस्परैक्यमतिता को [Agreement] कृणुष्व तू करनेवाली हो । अर्थात् तुम्हारे घर में शुभ विचार व सामञ्जस्य ही बना रहे ।
Connotation: - भावार्थ- पति पत्नी का परस्पर प्रेम हो । घर में सदा 'सुभद्रा-संवित्' बनी रहे । इस सम्पूर्ण सूक्त में यमी यम की परीक्षा लेती हुई उसे समीप सम्बन्ध के लिये प्रेरित करती है । परन्तु यम उस परीक्षा में उत्तीर्ण होकर दूर सम्बन्धों के महत्त्व को सुव्यक्त करता है। और प्रसंगवश 'घर को किस प्रकार सुन्दर बनाना चाहिए' इस बात का भी संकेत करता है। इस सुन्दर घर में 'किस प्रकार यज्ञादि में जीवन को बिताना चाहिए' इसका निर्देश करते हैं ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यमि) हे रात्रे ! (सु) सुष्ठु त्वदुक्तमेतद्वचः, तस्मात् (त्वम्-अन्यम्-उ) त्वमपि, अन्यं पुरुषं (लिबुजा इव वृक्षम्) वृक्षं यथा लता (परि स्वजाते) परिष्वजेथाः, तथा (अन्यः-उ) अन्यः पुरुषोऽपि (त्वां) परिष्वजाते-परिष्वजेत (त्वं वा) त्वं च “वा चार्थे पठितः” [निरु० १।४] (तस्य) पुरुषस्य (मनः-इच्छ) मनः कामयस्व (सः-वा) स च (तव) तव मनः कामयताम् (अधा) अनन्तरम् [ऋ० १।७२।७ दयानन्दस्तथा च सायणः] एवं जाते सति (संविदम्) नियोगरूपां प्रतिज्ञां (सुभद्राम्) सुसुखां (कृणुष्व) पूरय ‘संवित्-प्रतिज्ञा’ “संविदा देयम्” [तैति-उप०] ॥१४॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Yama: Some other may embrace you too and you embrace him like a creeper by the tree. Love you the other man and his heart, may he too love you and yours. Thus may you create and achieve a happy union in love and good fortune.