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य एक॒ इद्वि॒दय॑ते॒ वसु॒ मर्ता॑य दा॒शुषे॑। ईशा॑नो॒ अप्र॑तिष्कुत॒ इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग ॥

English Transliteration

ya eka id vidayate vasu martāya dāśuṣe | īśāno apratiṣkuta indro aṅga ||

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Pad Path

यः। एकः॑। इत्। वि॒ऽदय॑ते। वसु॑। मर्ता॑य। दा॒शुषे॑। ईशा॑नः। अप्र॑तिऽस्कुतः। इन्द्रः॑। अ॒ङ्ग ॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:84» Mantra:7 | Ashtak:1» Adhyay:6» Varga:6» Mantra:2 | Mandal:1» Anuvak:13» Mantra:7


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

Word-Meaning: - हे (अङ्ग) मित्र मनुष्य ! (यः) जो (इन्द्रः) सभा आदि का अध्यक्ष (एकः) सहायरहित (इत्) ही (दाशुषे) दाता (मर्त्ताय) मनुष्य के लिये (वसु) द्रव्य को (विदयते) बहुत प्रकार देता है और (ईशानः) समर्थ (अप्रतिष्कुतः) निश्चल है, उसी को सेना आदि में अध्यक्ष कीजिए ॥ ७ ॥
Connotation: - हे मनुष्यो ! तुम लोग जो सहायरहित भी निर्भय होके युद्ध से नहीं हटता तथा अत्यन्त शूर है, उसी को सेना का स्वामी करो ॥ ७ ॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

ईशानः अप्रतिष्कुतः

Word-Meaning: - १. गतमन्त्र के अनुसार 'जितेन्द्रियता से अनुपम शक्तिवाला बन जाने पर मनुष्य को गर्व न हो जाए', इस विचार से कहते हैं = हे (अङ्ग) = प्रिय ! (यः) = जो (एकः इत्) = अकेला ही (दाशुषे मर्ताय) = प्रभु के प्रति अपना अर्पण करनेवाले मनुष्य के लिए (वसु) = निवास के लिए सब आवश्यक तत्त्वों को (विदयते) = विशेषरूप से देता है, वह (इन्द्रः) = परमैश्वर्यशाली प्रभु ही (ईशानः) = तुझमें वर्तमान सब उत्तमताओं का स्वामी है । उस प्रभु की ही तेजस्विता व बुद्धि आदि तुझमें भास रही हैं - ये तेरी अपनी नहीं हैं । इनका ईशान प्रभु ही है । २. वे ही प्रभु (अप्रतिष्कुतः) = प्रतिकूल शब्द से रहित हैं । उनका कोई विरोधी व प्रतिद्वन्द्वी नहीं हो सकता - 'न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यः' उस शब्द की शक्ति से ही तू अपने को शक्ति - सम्पन्न हुआ जान । प्रभु की शक्ति को अपनी मानकर तू गर्वित न हो । जितना - जितना प्रभु के प्रति तू अपना अर्पण करता है, उतना - उतना प्रभु की शक्ति से तू सम्पन्न होता जाता है ।
Connotation: - भावार्थ = मनुष्य जितेन्द्रियता से शक्ति - सम्पन्न बनकर उस शक्ति को प्रभु की समझे और गर्वित न हो जाए ।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

Anvay:

हे अङ्ग मित्र मनुष्य ! य इन्द्र एक इद् दाशुषे मर्त्ताय वसु विदयते ईशानोऽप्रतिष्कुतोऽस्ति, तमेव सेनायामधिकुरुत ॥ ७ ॥

Word-Meaning: - (यः) एक असहायः (इत्) अपि (विदयते) विविधं दापयति (वसु) द्रव्यम् (मर्त्ताय) मनुष्याय (दाशुषे) दानशीलाय (ईशानः) समर्थः (अप्रतिष्कुतः) असंचलितः (इन्द्रः) सभाद्यध्यक्षः (अङ्ग) मित्र ॥ ७ ॥
Connotation: - हे मनुष्या ! यूयं यः सहायरहितोऽपि निर्भयो युद्धादपलायनशीलोऽतिशूरो भवेत्, तमेव सेनाध्यक्षं कुरुत ॥ ७ ॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Dear friend, the one sole lord who gives everything in life to the man of charity and generosity is Indra, supreme ruler of the world, who is constant, unmoved and unchallenged.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

How is Indra is taught further in the seventh Mantra.

Anvay:

O friend, make him an officer or commander of the army who even when alone bestows wealth to a person charitably disposed and is praised by all for his bravery and courage etc.; whose heroism is undisputed and unshakable.

Word-Meaning: - (विदयते) विविधं दापयति = Prompts to give in various ways. (अप्रतिष्कुत:) असंचलितः = Unshakable, invincible or un-disputed.
Connotation: - O men, you should appoint him as the commander of an army who whenever alone is fearless, who never runs away from the battle field and is very brave..

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - हे माणसांनो! जो मदत नसतानाही निर्भयतेने युद्धातून हटत नाही व अत्यंत शूर असतो. त्यालाच सेनापती करा. ॥ ७ ॥