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तमित्सु॑ह॒व्यम॑ङ्गिरः सुदे॒वं स॑हसो यहो। जना॑ आहुः सुब॒र्हिष॑म् ॥

English Transliteration

tam it suhavyam aṅgiraḥ sudevaṁ sahaso yaho | janā āhuḥ subarhiṣam ||

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Pad Path

तम्। इत्। सु॒ऽह॒व्यम्। अ॒ङ्गि॒रः॒। सु॒ऽदे॒वम्। स॒ह॒सः॒। य॒हो॒ इति॑। जनाः॑। आ॒हुः॒। सु॒ऽब॒र्हिष॑म् ॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:74» Mantra:5 | Ashtak:1» Adhyay:5» Varga:21» Mantra:5 | Mandal:1» Anuvak:13» Mantra:5


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर वह विद्वान् कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में कहा है ॥

Word-Meaning: - हे (अङ्गिरः) अङ्गों के रसरूप (सहसः) बल के (यहो) पुत्ररूप विद्वान् मनुष्य ! जिस तुझको बिजुली के तुल्य (सुदेवम्) दिव्यगुणों के देने (सुबर्हिषम्) विज्ञानयुक्त (सुहव्यम्) उत्तम ग्रहण करनेवाले आपको (जनाः) विद्वान् लोग (आहुः) कहते हैं (तम्) उसको (इत्) ही हम लोग सेवन करें ॥ ५ ॥
Connotation: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों के संग से पदार्थविद्या को जान और सम्यक् परीक्षा करके अन्य मनुष्यों को जनावें ॥ ५ ॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सुहव्य - सदेव - सुबर्हिष्

Word-Meaning: - १. गतमन्त्र के अनुसार जो भी व्यक्ति तीन बातों को अपने जीवन में लाने का प्रयत्न करता है (तम् इत्) = उसको ही (जनाः) = लोग (सुहव्यम्) = उत्तम ‘हव्य - यज्ञीय - सात्विक’ पदार्थोंवाला (आहुः) = कहते हैं । लोगों में उसकी प्रसिद्धि ‘सुहव्य’ नाम से होती है । २. हे (अङ्गिरः) = अङ्ग - अङ्ग में रस का सञ्चार करनेवाले प्रभो ! इस सुहव्य के जीवन में भी इन सात्त्विक पदार्थों के सेवन से सचमुच रस का सञ्चार होता है । ये अन्न उसकी ‘आयु, सत्त्व, बल, आरोग्य सुख व प्रीति’ के बढ़ानेवाले होते हैं । ये उसके लिए ‘रस्य, स्निग्ध, स्थिर व हृद्य’ होते हैं । ३. हे (सहसो यहो) = बल के पुत्र [बल के पुतले, शरीरधारी बल] प्रभो ! लोग उसे (सुदेवम्) = उत्तम विजिगीषावाला [दिव् विजिगीषा] कहते हैं । सात्त्विक अन्नों के सेवन से उसके जीवन में बल और आरोग्य का वर्धन होता है और जितना - जितना उसका बल बढ़ता है, उतना - उतना वह कामादि शत्रुओं को जीतने की इच्छावाला होता है । इनको जीतकर वह ‘सुदेव’ बनता है । ४. कामादि को जीतनेवाले इस व्यक्ति को ही (सुबर्हिषम्) = [उद्बर्हण = विनाश] उत्तमता से वासनाओं का विनाश करने के कारण निर्वासन हृदयवाला कहते हैं ।
Connotation: - भावार्थ - हम ‘अङ्गिर’ व ‘सहसो यहो’ इन नामों से प्रभु का उपासन करते हुए ‘सुहव्य, सुदेव व सुबर्हिष’ बनने का प्रयत्न करें ।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

Anvay:

हे अङ्गिरः सहसो यहो विद्वन् ! यं त्वामग्निमिव सुदेवं सुबर्हिषं सुहव्यं जना आहुस्तमिद्वयं सेवेमहि ॥ ५ ॥

Word-Meaning: - (तम्) उक्तम् (इत्) एव (सुहव्यम्) शोभनानि हव्यनानि यस्य तम् (अङ्गिरः) अङ्गानां रसरूप (सुदेवम्) शोभनश्चासौ देवो दिव्यगुणो दाता च तम् (सहसः) प्रशस्तबलयुक्तस्य (यहो) पुत्र (जनाः) विद्वांसः (आहुः) कथयन्ति (सुबर्हिषम्) शोभनानि बर्हींष्यन्तरिक्षोदकविज्ञानानि तस्य तम् ॥ ५ ॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्विद्वत्सु प्रख्यातस्य विदुषः सकाशात् पदार्थविद्यां विदित्वा सम्प्रयुज्याऽन्येभ्यो वेदयितव्या च ॥ ५ ॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni, Angira, breath of life for the world arising in yajna as the child of omnipotence, you are the same whom people call the lord of brilliance, master of science, waters and of the skies, worthy of being invoked in yajna for the gifts of wonderful wealths.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

Anvay:

O dear like life, son of a noble mighty person, let us serve you who are shining like fire and whom men call full of divine attributes and liberal donor, endowed with good knowledge and full of most acceptable virtues.

Word-Meaning: - (अंगिरः) अंगानां रसरूपः = Dear like the Prana which is the essence of all organs. (सहसः यहो) प्रशस्तबलयुक्तस्य पुत्र = The son of a noble mighty person. (सुबहिषम् ) शोभनानि बहिर्षि-विज्ञानानि यस्य तम् = Endowed with good knowledge.
Connotation: - Men should acquire scientific knowledge from a well-known person among the learned, should learn its application and teach it to others.
Footnote: प्राणो वा अंगिरा: (शतपथे ६१२२८ ॥ ६.५.२.३,४) सहः इति बलनाम (निघ० २.६) यहुः इति अत्यनाम (निघ० २.२ ) बहि: इति पदनाम (निघ०५.२ ) पद गतौ नत्र गते स्त्रिष्वर्थेषु ज्ञानार्थग्रहरणम्

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. माणसांनी विद्वानांच्या संगतीने पदार्थविद्या जाणून सम्यक परीक्षा करून इतर माणसांना शिकवावे. ॥ ५ ॥