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अ॒स्येदु॒ प्र ब्रू॑हि पू॒र्व्याणि॑ तु॒रस्य॒ कर्मा॑णि॒ नव्य॑ उ॒क्थैः। यु॒धे यदि॑ष्णा॒न आयु॑धान्यृघा॒यमा॑णो निरि॒णाति॒ शत्रू॑न् ॥

English Transliteration

asyed u pra brūhi pūrvyāṇi turasya karmāṇi navya ukthaiḥ | yudhe yad iṣṇāna āyudhāny ṛghāyamāṇo niriṇāti śatrūn ||

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Pad Path

अ॒स्य। इत्। ऊँ॒ इति॑। प्र। ब्रू॒हि॒। पू॒र्व्याणि॑। तु॒रस्य॑। कर्मा॑णि। नव्यः॑। उ॒क्थैः। यु॒धे। यत्। इ॒ष्णा॒नः। आयु॑धानि। ऋ॒घा॒यमा॑णः। नि॒ऽरि॒णाति॑। शत्रू॑न् ॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:61» Mantra:13 | Ashtak:1» Adhyay:4» Varga:29» Mantra:3 | Mandal:1» Anuvak:11» Mantra:13


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर वह सभाध्यक्ष क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

Word-Meaning: - हे विद्वन् मनुष्य ! (यत्) जो सभा आदि का पति जैसे (ऋघायमाणः) मरे हुए के समान आचरण करनेवाले (आयुधानि) तोप, बन्दूक, तलवार आदि शस्त्र-अस्त्रों को (इष्णानः) नित्य-नित्य सम्हालते और शोधते हुए (नव्यः) नवीन शस्त्रास्त्र विद्या को पढ़े हुए आप (युधे) संग्राम में (शत्रून्) दुष्ट शत्रुओं को (निरिणाति) मारते हो, उस (तुरस्य) शीघ्रतायुक्त (अस्य) सभापति आदि के (इत्) ही (उक्थैः) कहने योग्य वचनों से (पूर्व्याणि) प्राचीन सत्पुरुषों ने किये (कर्माणि) करने योग्य और करनेवाले को अत्यन्त इष्ट कर्मों को करता है, वैसे (प्र ब्रूहि) अच्छे प्रकार कहो ॥ १३ ॥
Connotation: - मनुष्यों को चाहिये कि सभाध्यक्ष आदि के विद्या, विनय, न्याय और शत्रुओं को जीतना आदि कर्मों की प्रशंसा करके और उत्साह देकर इन का सदा सत्कार करें तथा इन सभाध्यक्ष आदि राजपुरुषों से शस्त्रास्त्र चलाने की शिक्षा और शिल्पविद्या की चतुराई को प्राप्त हुए सेना में रहनेवाले वीर पुरुषों के साथ शत्रुओं को जीत कर प्रजा की निरन्तर रक्षा करें ॥ १३ ॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

आयुधों की प्राप्ति

Word-Meaning: - १. (अस्य) = इस (तुरस्य) = [त्वर्] शीघ्रता से कार्यों को करनेवाले अथवा [तुर्वी] शत्रु - संहारक (नव्यः) = स्तुति के योग्य प्रभु के (पूर्व्याणि) = जीव की पूर्णता के साधक (कर्माणि) = कार्यों को (इत् उ) = ही (उक्थैः) = स्तोत्रों के द्वारा (प्रब्रूहि) = प्रतिपादन कर । २. (यत्) = चूंकि प्रभु ही (युधे) = युद्ध के लिए, वासनात्मक वृत्र के साथ संग्राम के लिए (आयुधानि) = क्रियाशीलता व ज्ञान आदि आयुधों को (इष्णानः) = प्राप्त कराते हुए (ऋघायमाणः) = शत्रुओं की हिंसा के हेतु से (शत्रून् निरिणाति) = शत्रुओं के अभिमुख जाते हैं । शत्रुओं पर आक्रमण प्रभु ही करते हैं । हमारे लिए इनपर आक्रमण करते हुए वे प्रभु हमें विजयी बनाते हैं । प्रभु के ये शत्रु - संहारात्मक कर्म पूर्व्य हैं, हमारा पूरण करनेवाले हैं । इन कर्मों के स्तवन से हमें प्रेरणा मिलती है और हममें शक्ति का सञ्चार होता है । इन अध्यात्म - शत्रुओं के साथ युद्ध के लिए हम उत्साहित होते हैं और इन शत्रुओं को परास्त करते हैं ।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु हमें कामादि शत्रुओं के साथ युद्ध के लिए ज्ञान व कर्मरूप अस्त्रों को प्राप्त कराते हैं । हमें इस युद्ध के लिए उत्साहयुक्त करते हैं ।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनः स सभाध्यक्षः किं कुर्य्यादित्युपदिश्यते ॥

Anvay:

हे विद्वन् ! यद्यः सभाद्यध्यक्षो यथर्घायमाण आयुधानीष्णानो नव्यो युधे शत्रून् निरिणाति तस्य तुरस्येदुक्थैः पूर्व्याणि नव्यानि च कर्माणि करोति तथा त्वं प्रब्रूहि ॥ १३ ॥

Word-Meaning: - (अस्य) सभाद्यध्यक्षस्य (इत्) अपि (उ) आकाङ्क्षायाम् (प्र) प्रत्यक्षे (ब्रूहि) कथय (पूर्व्याणि) पूर्वैः कृतानि (तुरस्य) त्वरमाणस्य (कर्माणि) कर्त्तुं योग्यानि कर्त्तुरीप्सिततमानि (नव्यः) नवान्येव नव्यानि नूतनानि (उक्थैः) वक्तुं योग्यैः वचनैः (युधे) युध्यन्ति अस्मिन् संग्रामे तस्मै (यत्) यः (इष्णानः) अभीक्ष्णं निष्पादयन् शोधयन् (आयुधानि) शतघ्नीभुशुण्ड्यादीनि शस्त्राणि, आग्नेयादीन्यस्त्राणि वा (ऋघायमाणः) ऋघो हिंसित इवाचरति। अत्र रघधातो बाहुलकाद् औणादिकोऽन् प्रत्ययः। सम्प्रसारणं च तत आचारे क्यङ्। (निरिणाति) नित्यं हिनस्ति (शत्रून्) वैरिणो दुष्टान् ॥ १३ ॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैः सभाद्यध्यक्षादीनां विद्याविनयशत्रुपराजयकरणादीनि कर्माणि प्रशंस्योत्साह्यैते सदा सत्कर्त्तव्याः। एतै राजपुरुषैः शस्त्रास्त्रशिक्षाशिल्पकुशलान् सेनास्थान् वीरान् सङ्गृह्य शत्रून् पराजित्य प्रजाः सततं संरक्ष्याः ॥ १३ ॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Sing and celebrate the old and new exploits of this fast and powerful Indra in songs of praise, Indra who, passionate and tempestuous, updating and wielding the weapons for battle, strikes and destroys the enemies.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - माणसांनी सभाध्यक्ष इत्यादीच्या विद्या, विनय, न्याय व शत्रूंना जिंकणे इत्यादी कर्मांची प्रशंसा करून उत्साहित करावे व त्याचा सदैव सत्कार करावा. या सभाध्यक्ष इत्यादी राजपुरुषांनी शस्त्रास्त्र चालविण्याचे शिक्षण व शिल्पविद्येच्या चतुराईने प्राप्त झालेल्या सेनेतील वीर पुरुषांबरोबर राहून शत्रूंना जिंकून प्रजेचे सदैव रक्षण करावे. ॥ १३ ॥