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नू चि॑त्सहो॒जा अ॒मृतो॒ नि तु॑न्दते॒ होता॒ यद्दू॒तो अभ॑वद्वि॒वस्व॑तः। वि साधि॑ष्ठेभिः प॒थिभी॒ रजो॑ मम॒ आ दे॒वता॑ता ह॒विषा॑ विवासति ॥

English Transliteration

nū cit sahojā amṛto ni tundate hotā yad dūto abhavad vivasvataḥ | vi sādhiṣṭhebhiḥ pathibhī rajo mama ā devatātā haviṣā vivāsati ||

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Pad Path

नु। चि॒त्। स॒हः॒ऽजाः। अ॒मृतः॑। नि। तु॒न्दते॑। होता॑। यत्। दू॒तः। अभ॑वत्। वि॒वस्व॑तः। वि। साधि॑ष्ठेभिः। प॒थिऽभिः॑। रजः॑। म॒मे॒। आ। दे॒वऽता॑ता। ह॒विषा॑। वि॒वा॒स॒ति॒ ॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:58» Mantra:1 | Ashtak:1» Adhyay:4» Varga:23» Mantra:1 | Mandal:1» Anuvak:11» Mantra:1


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

अब अट्ठावनवें सूक्त का आरम्भ है। उस के पहिले मन्त्र में अग्नि के दृष्टान्त से जीव के गुणों का उपदेश किया है ॥

Word-Meaning: - हे मनुष्यो ! (यत्) जो (चित्) विद्युत् के समान स्वप्रकाश (अमृतः) स्वस्वरूप से नाशरहित (सहोजाः) बल को उत्पादन करने हारा (होता) कर्मफल का भोक्ता सब मन और शरीर आदि का धर्त्ता (दूतः) सबको चलाने हारा (अभवत्) होता है (देवताता) दिव्यपदार्थों के मध्य में दिव्यस्वरूप (साधिष्ठेभिः) अधिष्ठानों से सह वर्त्तमान (पथिभिः) मार्गों से (रजः) पृथिवी आदि लोकों को (नु) शीघ्र बनाने हारे (विवस्वतः) स्वप्रकाश स्वरूप परमेश्वर के मध्य में वर्त्तमान होकर (हविषा) ग्रहण किये हुए शरीर से सहित (नि तुन्दते) निरन्तर जन्म-मरण आदि में पीड़ित होता और अपने कर्मों के फलों का (विवासति) सेवन और अपने कर्म में (व्याममे) सब प्रकार से वर्त्तता है, सो जीवात्मा है, ऐसा तुम लोग जानो ॥ १ ॥
Connotation: - हे मनुष्य लोगो ! तुम अनादि अर्थात् उत्पत्तिरहित, सत्यस्वरूप, ज्ञानमय, आनन्दस्वरूप, सर्वशक्तिमान्, स्वप्रकाश, सबको धारण और सबके उत्पादक, देश-काल और वस्तुओं के परिच्छेद से रहित और सर्वत्र व्यापक परमेश्वर में नित्य व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध से जो अनादि, नित्य, चेतन, अल्प, एकदेशस्थ और अल्पज्ञ है, वही जीव है, ऐसा निश्चित जानो ॥ १ ॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सहस्वी व अमृत [नीरोग]

Word-Meaning: - १. गतमन्त्र के अनुसार अविद्या - पर्वत के विदारण होने पर हमें सब इन्द्रियों की शक्ति प्राप्त होगी । हम पाँच ज्ञानेन्द्रियों व पाँच कर्मेन्द्रियों में जिह्वा के दोनों ओर होने से संख्या में नौ - की - नौ इन्द्रियों के धारण करनेवाले [नोधा - नवधा] होंगे और इनके उत्तम होने से 'गौतम' प्रशस्त इन्द्रियोंवाले होंगे । नोधा गौतम बनकर हम ५८ से ६४ वें सूक्त तक के मन्त्रों के ऋषि होंगे । यह 'नोधा गौतम' (नू चित्) = शीघ्र ही (सहोजाः) = सहस् में प्रादुर्भूत होनेवाला होता है । गतमन्त्र की समाप्ति 'दधिषे केवलं सहः' - इन शब्दों पर हुई थी । इस मन्त्र का प्रारम्भ इसी भावना से हुआ है । यह गौतम शक्तिसम्पन्न होता है । यह जन्मजात शक्ति से युक्त होता है । २. इसी का यह परिणाम है कि (अमृतः) = यह रोगरूप शतसंख्याक मृत्युओं का शिकार नहीं होता । यह स्वस्थ होता हुआ (नितुन्दते) = निश्चय से गतिवाला होता है अथवा नम्रता से गतिवाला होता है । वास्तविकता तो यह है कि यह सारी गति को प्रभुशक्ति से होता हुआ मानता है और कभी किसी भी कार्य का अभिमान नहीं करता ३. (होता) = यह होता बनता है, दानपूर्वक अदन करनेवाला होता है, यज्ञशेष का सेवन करता है और (यत्) = जो (विवस्वतः) = उस ज्ञान की किरणोंवाले प्रभु का (दूतः) = सन्देशहर (अभवत्) = होता है । यज्ञशेष का सेवन करनेवाला ही प्रभु का दूत बन सकता है । ४. यह (साधिष्ठेभिः) = अधिक - से - अधिक लोकहित का साधन करनेवाले (पथिभिः) = मार्गों से चलता हुआ (रजः) = हृदयान्तरिक्ष को (विममे) = बहुत सुन्दर बनाता है और (देवताता) = जिसमें दिव्य गुणों का विकास होता है या जो दिव्य गुणोंवालों से विस्तृत किये जाते हैं, उन यज्ञों में (हविषा) = हवि के द्वारा, दानपूर्वक अदन के द्वारा (आविवासति) = उस प्रभु की परिचर्या करता है । प्रभु की परिचर्या वस्तुतः यही है कि हम साधिष्ठ मार्गों से चलते हुए हवि का सेवन करनेवाले बनें ।
Connotation: - भावार्थ - हम शक्तिसम्पन्न व नीरोग बनकर नम्रता से गतिमय जीवनवाले हों । देने की वृत्तिवाले बनकर प्रभु के सन्देश को सर्वत्र फैलाएँ । साधिष्ठ मार्गों से चलते हुए हृदयान्तरिक्ष को उत्तम बनाएँ । यज्ञों में हवि द्वारा प्रभु का अर्चन करें ।
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

अथाऽग्निदृष्टान्तेन जीवगुणा उपदिश्यन्ते ॥

Anvay:

हे मनुष्या ! यद्यश्चिद्विद्युदिवाऽमृतः सहोजा होता दूतोऽभवद् देवताता साधिष्ठेभिः पथिभी रजो नु निर्मातुर्विवस्वतो मध्ये वर्त्तमानः सन् हविषा सह विवासति स्वकीये कर्मणि व्याममे स जीवात्मा वेदितव्यः ॥ १ ॥

Word-Meaning: - (नु) शीघ्रम् (चित्) इव (सहोजाः) यः सहसा बलेन प्रसिद्धः (अमृतः) नाशरहितः (नि) नितराम् (तुन्दते) व्यथते। अत्र वाच्छन्दसि सर्वे विधयो भवन्ति इति नुमागमः। (होता) अत्ता खल्वादाता (यत्) यः (दूतः) उपतप्ता देशान्तरं प्रापयिता (अभवत्) भवति (विवस्वतः) परमेश्वरस्य (वि) विशेषार्थे (साधिष्ठेभिः) अधिष्ठोऽधिष्ठानं समानमधिष्ठानं येषां तैः (पथिभिः) मार्गैः (रजः) पृथिव्यादिलोकसमूहम् (ममे) मिमीते (आ) सर्वतः (देवताता) देवा एव देवतास्तासां भावः (हविषा) आदत्तेन देहेन (विवासति) परिचरति ॥ १ ॥
Connotation: - हे मनुष्या ! यूयमनादौ सच्चिदानन्दस्वरूपे सर्वशक्तिमति स्वप्रकाशे सर्वाऽऽधारेऽखिलविश्वोत्पादके देशकालवस्तुपरिच्छेदशून्ये सर्वाभिव्यापके परमेश्वरे नित्येन व्याप्यव्यापकसम्बन्धेन योऽनादिर्नित्यश्चेतनोऽल्पोऽल्पज्ञोऽस्ति स एव जीवो वर्त्तत इति बोध्यम् ॥ १ ॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni, surely born of strength and omnipotence, and immortal, never hurts. Giver and receiver of oblations, it is the carrier of yajna and inspirations of the Divine. Coexistent with other powers of nature, it traverses the paths of spaces from earth to heavens. Divine among divinities, when it is fed on holy offerings, it shines itself and shines others with light.
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ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The attributes of the soul are taught by the illustration of the fire.

Anvay:

O men, you should know that the soul is immortal, like electricity well-known on account of her strength, the enjoyer of the fruit of actions and sufferer on account of evil deeds, taking us to distant places as conscious entity. She moves in the worlds by various paths with the body being possessed of divine attributes and being established in God, who is Creator of the world.

Word-Meaning: - ( होता) अत्ता खलु आदाता = Enjoyer of the fruit of action and taker of external objects. (टूत:) उप तप्ता देशान्तरं प्रापयिता = Sufferer on account of bad actions and taker to distant places, being a conscious entity. (हविषा) आदत्तेन देहेन = With body that the soul assumes.
Connotation: - O men, you should know that the soul is ever pervaded by God who is eternal, Absolute Existenc3, Absolute Conscious pervaded-ness and Perfect Bliss, Omnipotent, Self-refulgent, the Support and Creator of the world, Infinite, Omnipresent Supreme Being The soul is eternal, conscious, finite and not omniscient.
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MATA SAVITA JOSHI

या सूक्तात अग्नी किंवा विद्वानांचे गुणवर्णन करण्याने या सूक्तार्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे. ॥

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - हे माणसांनो ! तुम्ही अनादी अर्थात् उत्पत्तिरहित, सत्यस्वरूप, ज्ञानमय, आनंदस्वरूप, सर्वशक्तिमान, स्वप्रकाशस्वरूप, सर्वांचा धारणकर्ता, संपूर्ण विश्वाचा उत्पत्तिकर्ता, स्थान, काल वस्तूच्या सीमेपेक्षा भिन्न, सर्वत्र व्यापक परमेश्वरामध्ये नित्य व्याप्य-व्यापक संबंधाने जो अनादी, नित्य, चेतन अल्प, एकदेशी व अल्पज्ञ आहे, तोच जीव आहे हे निश्चित जाणा. ॥ १ ॥