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अ॒रित्रं॑ वां दि॒वस्पृ॒थु ती॒र्थे सिन्धू॑नां॒ रथः॑ । धि॒या यु॑युज्र॒ इन्द॑वः ॥

English Transliteration

aritraṁ vāṁ divas pṛthu tīrthe sindhūnāṁ rathaḥ | dhiyā yuyujra indavaḥ ||

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Pad Path

अ॒रित्र॑म् । वा॒म् । दि॒वः । पृ॒थु । ती॒र्थे । सिन्धू॑नाम् । रथः॑ । धि॒या । यु॒यु॒ज्रे॒ । इन्द॑वः॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:46» Mantra:8 | Ashtak:1» Adhyay:3» Varga:34» Mantra:3 | Mandal:1» Anuvak:9» Mantra:8


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर वह यान किस प्रकार का करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

Word-Meaning: - हे कारीगरो ! जो (वाम्) आप लोगों का (पृथु) विस्तृत (रथः) यानसमूह अर्थात् अनेकविध सवारी हैं उनको (सिंधूनाम्) समुद्रों के (तीर्थे) तराने वाले में (अरित्रम्) यान रोकने और बहुत जल के थाह ग्रहणार्थ लोहे का साधन (दिवः) प्रकाशमान बिजुली अग्न्यादि और (इन्दवः) जलादिको आप (युयुज्रे) युक्त कीजिये ॥८॥
Connotation: - कोई भी मनुष्य अग्नि आदि से जलनेवाले यान अर्थात् सवारी के विना पृथिवी समुद्र और अन्तरिक्ष में सुख से आने जाने को समर्थ नहीं हो सकता ॥८॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

ज्ञान का विस्तृत चप्पू

Word-Meaning: - १. हे अश्विदेवो ! (वाम्) - आपका (रथः) - यह शरीररूपी रथ (सिन्धूनां तीर्थे) - समुद्रों के अवतारण प्रदेश में (दिवः) - ज्ञान का (पृथु) - विस्तृत (अरित्रम्) - चप्पू है, अर्थात् प्राणसाधना से मनुष्य की बुद्धि सूक्ष्म व विस्तृत होती है और यह बुद्धि ही संसार - समुद्र को तैरने के लिए ज्ञान का विस्तृत चप्पू बनती है तथा हमारी जीवन - नौका को भवसिन्धु से पार लगाती है । स्थल में जो रथ था, जल में वह नौका बन जाती है । इन्द्रियाँ इस नाव की चप्पू हैं ।  २. इस बुद्धि व ज्ञान के रहस्य को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि (इन्दवः) - सोमकण (धिया) - बुद्धि से (युयुज्रे) - युक्त होते हैं, अर्थात् ये सोमकण ही सुरक्षित होकर ज्ञानाग्नि का ईंधन बनते हैं और सूक्ष्मबुद्धि को उत्पन्न करते हैं । 'योगाङ्गों के अनुष्ठान से विश्लेषणात्मक बुद्धि उत्पन्न होती है और हमारा ज्ञान चमक उठता है, एवं योगाङ्गों के अनुष्ठान से सोम का भी रक्षण होता है और सोम का रक्षण होकर दीप्त बुद्धि उत्पन्न हुआ करती है । प्राणायाम से सोमरक्षण तथा सोमरक्षण से बुद्धि की उत्पत्ति - यह क्रम है । इस सूक्ष्म बुद्धि से यात्रा की पूर्ति होती है, चूंकि यह प्रभुदर्शन का कारण बनती है । प्रभुदर्शन के बाद जीवन की आवश्यकता नहीं रह जाती, अतः मनुष्य का जीवन सार्थक हो जाता है ।   
Connotation: - भावार्थ - अश्विनीदेवों की साधना मानवजीवन - नौका के लिए ज्ञान के विस्तृत चप्पू को प्राप्त कराती है । प्राणसाधना से सोमरक्षण होता है और सोमरक्षण से ज्ञान की दीप्ति ।   

SWAMI DAYANAND SARSWATI

(अरित्रम्) यानस्तम्भनार्थं जलगाधग्रहणार्थं वा लोहमयं साधनम् (वाम्) युवयोः (दिवः) द्योतमानात्मकविद्युद्ग्न्यादिपदार्थैर्युक्तम् (पृथु) विस्तीर्णम् (तीर्थे) तरति येन तस्मिन्नर्थे (सिन्धूनाम्) समुद्रादीनाम् (रथः) यानसमूहः (धिया) क्रियया (युयुज्रे) योज्यन्ताम्। अत्र लोङर्थे लिट्। इरयोरे। अ० ६।४।७६। इति रे# आदेशः। (इन्दवः) जलानि। इन्दुरित्युदकना०। निघं० १।१२। ॥८॥ #[इरेश् स्थाने रे, आदेश इत्यर्थः। सं०]

Anvay:

पुनस्तत् कीदृशं कर्त्तव्यमित्युपदिश्यते।

Word-Meaning: - हे शिल्पिनौ ! यो वां पृथु रथोऽस्ति तत्र सिंधूनां (तीर्थे) यानेऽरित्रं दिवोऽग्न्यादीनीन्दवो जलानि च युवाभ्यां युयुज्रे योज्यन्ताम् ॥८॥
Connotation: - न किल कश्चिदग्निजलादिचालनयुक्तेन यानेन विना भूसमुद्रान्तरिक्षेषु सुखेन गन्तुं शक्नोति ॥८॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Ashvins, scientists and engineers, for crossing of the seas and skies to your destination, let your chariot and propulsion be elaborate and powerful by design and structure using water and fire power and electric and solar energy.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The same subject is continued.

Anvay:

O expert artisans, harness in your Chariot cars and other shining electrical implements for journey in the sea and its shore. Let fire and water etc. be combined in proper proportion.

Word-Meaning: - ( इन्दवः ) जलानि इन्दुरित्युदकनाम ( निघ० १.१२ ) (दिव:) द्योतनात्मक विद्युदग्न्यादिपदार्थैर्युक्तम् = A shining implement made with fire, electricity etc.
Connotation: - None can travel by land, sea and firmament comfortably without the vehicles driven by the combination of the fire, water and other suitable articles.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - कोणीही माणूस अग्नी, जल इत्यादींनी चालणाऱ्या यानाशिवाय अर्थात वाहनाशिवाय पृथ्वी, समुद्र व अंतरिक्षात सुखाने येण्या-जाण्यास समर्थ होऊ शकत नाही. ॥ ८ ॥