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यद्यू॒यं पृ॑श्निमातरो॒ मर्ता॑सः॒ स्यात॑न । स्तो॒ता वो॑ अ॒मृतः॑ स्यात् ॥

English Transliteration

yad yūyam pṛśnimātaro martāsaḥ syātana | stotā vo amṛtaḥ syāt ||

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Pad Path

यत् । यू॒यम् । पृ॒श्नि॒मा॒त॒रः॒ । मर्ता॑सः । स्यात॑न । स्तो॒ता । वः॒ । अ॒मृतः॑ । स्यात्॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:38» Mantra:4 | Ashtak:1» Adhyay:3» Varga:15» Mantra:4 | Mandal:1» Anuvak:8» Mantra:4


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर वे राजपुरुष कैसे होने चाहियें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

Word-Meaning: - हे (पृश्निमातरः) जिन वायुओं का माता आकाश है उनके सदृश (मर्त्तासः) मरणधर्म युक्त राजा और प्रजा के पुरुषों ! आप पुरुषार्थ युक्त (यत्) जो अपने-२ कामों में (स्यातन) हों तो (वः) तुम्हारी रक्षा करनेवाला सभाध्यक्ष राजा (अमृतः) अमृत सुखयुक्त स्यात् होवें ॥४॥
Connotation: - राजा और प्रजा के पुरुषों को उचित है कि आलस्य छोड़ वायु के समान अपने-२ कामों में नियुक्त होवें, जिससे सब का रक्षक सभाध्यक्ष राजा शत्रुओं से मारा नहीं जा सकता+ ॥४॥ +स० भा० के अनुसार सके। सं०

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

अमृतता

Word-Meaning: - १. 'पृश्नि' शब्द का अर्थ है 'प्रकाश की किरण' । वस्तुतः इन सूर्यकिरणों से ही सारी प्राणशक्ति उत्पन्न होती है, इसलिए यहाँ प्राणों को 'पृश्निमातरः' कहा है । सूर्यकिरणें हैं निर्माण करनेवाली जिनका । (यत्) - यद्यपि हे (पृश्निमातरः) - सूर्य से उत्पन्न प्राणो ! (यूयम्) - तुम (मर्तासः) - मरणधर्मा (स्यातन) - हो तो भी (वः स्तोता) - तुम्हारा स्तवन करनेवाला (अमृतः स्यात्) - अमृत होता है । प्राणसाधना करनेवाला व्यक्ति रोगों का शिकार नहीं होता ।  २. सूर्यकिरणों से पैदा की गई प्राणशक्ति अस्थिर व नश्वर तो है ही, इसी से इन प्राणों को 'मर्त' कहा है ; परन्तु प्राणसाधना करनेवाला व्यक्ति रोगों से बचा रहता है और इस प्रकार अ-मृत होता है ।   
Connotation: - भावार्थ - प्राणशक्ति सूर्यकिरणों से उत्पन्न होती है और अपने साधकों को रोगों का शिकार नहीं होने देती ।   

SWAMI DAYANAND SARSWATI

(यत्) यदि (यूयम्) (पृश्निमातरः) पृश्निराकाशो माता येषां वायूनां त इव (मर्त्तासः) मरणधर्माणो राजप्रजा जनाः। अत्राज्जसेरसुग् इत्यसुगागमः। (स्यातन) भवेत। तस्यतनवादेशः। (स्तोता) स्तुतिकर्त्ता सभाध्यक्षो राजा (वः) युष्माकम् (अमृतः) शत्रुभिरप्रतिहतः (स्यात्) भवेत् ॥४॥

Anvay:

पुनस्ते कीदृशाः स्युरित्युपदिश्यते।

Word-Meaning: - हे पृश्निमातर इव वर्त्तमाना मर्त्तासो यूयं यद्यदि पुनषार्थिनः स्यातन तर्हि वः स्तोताऽमृतः स्यात् ॥४॥
Connotation: - राजप्रजापुरुषैरालस्यं त्यक्त्वा वायव इव स्वकर्मसु नियुक्तैर्भवितव्यम्। यत एतेषां रक्षकः सभाध्यक्षो राजा शत्रुभिर्हन्तुमशक्यो भवेत् ॥४॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Maruts, children of mother-space, heroes of the nation and children of the colourful mother earth doing good work, though you are mortal, the Immortal is your protector.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

How should be the men of the State is taught in the next Mantra.

Anvay:

O men behaving like the airs whose mother is the firmament the President of the if you become industrious, your admirer - Assembly, may become inviolable by his enemies.

Word-Meaning: - ( पृश्निमातरः ) पृश्नि:-आकाशः माता येषां वायूनांत इव = Like the winds whose mother is the firmament or atmosphere ( अमृतः) शत्रुभिः अप्रतिहतः = Not killed by the enemies.
Connotation: - The officers the State and their subjects should also give up indolence and be engaged in discharging their duties like the winds that go on incessantly, so that their protector, the President of the Assembly or the council of Ministers, may not be killed by the enemies of the State.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - राजा व प्रजा यांनी आळस सोडून वायूप्रमाणे आपापल्या कामात नियुक्त व्हावे. ज्यामुळे सर्वांचा रक्षक, सभाध्यक्ष राजा शत्रूंकडून मारला जाऊ शकत नाही. ॥ ४ ॥