Go To Mantra

आ ना॑सत्या॒ गच्छ॑तं हू॒यते॑ ह॒विर्मध्वः॑ पिबतं मधु॒पेभि॑रा॒सभिः॑ । यु॒वोर्हि पूर्वं॑ सवि॒तोषसो॒ रथ॑मृ॒ताय॑ चि॒त्रं घृ॒तव॑न्त॒मिष्य॑ति ॥

English Transliteration

ā nāsatyā gacchataṁ hūyate havir madhvaḥ pibatam madhupebhir āsabhiḥ | yuvor hi pūrvaṁ savitoṣaso ratham ṛtāya citraṁ ghṛtavantam iṣyati ||

Mantra Audio
Pad Path

आ । ना॒स॒त्या॒ । गच्छ॑तम् । हू॒यते॑ । ह॒विः । मध्वः॑ । पि॒ब॒त॒म् । म॒धु॒पेभिः॑ । आ॒सभिः॑ । यु॒वोः । हि । पूर्व॑म् । स॒वि॒ता । उ॒षसः॑ । रथ॑म् । ऋ॒ताय॑ । चि॒त्रम् । घृ॒तव॑न्तम् । इष्य॑ति॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:34» Mantra:10 | Ashtak:1» Adhyay:3» Varga:5» Mantra:4 | Mandal:1» Anuvak:7» Mantra:10


Reads 506 times

SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उनसे क्या सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

Word-Meaning: - हे शिल्पिलोगो ! तुम दोनों (नासत्या) जल और अग्नि के सदृश जिस (हविः) सामग्री का (हूयते) हवन करते हो उस हवि से शुद्ध हुए (मध्वः) मीठे जल (मधुपेभिः) मीठे मीठे जल पीनेवाले (आसभिः) अपने मुखों से (पिबतम्) पियो और हम लोगों को आनन्द देने के लिये (घृतवन्तम्) बहुत जल की कलाओं से युक्त (चित्रम्) वेगादि आश्चर्य्य गुणसहित (रथम्) विमानादि यानों से देशान्तरों को (गच्छतम्) शीघ्र जाओं आओ (युवाः) तुम्हारा जो रथ (उषसः) प्रातःकाल से (पूर्वम्) पहिले (सविता) सूर्यलोक के समान प्रकाशमान (इष्यति) शीघ्र चलता है (हि) वही (ऋताय) सत्य सुख के लिये समर्थ होता है ॥१०॥
Connotation: - जब यानों में जल और अग्नि को प्रदीप्त करके चलाते हैं तब ये यान और स्थानों को शीघ्र प्राप्त कराते हैं उनमें जल और बाफ के निकलने का एक ऐसा स्थान रच लेवें कि जिसमें होकर बाफ के निकलने से वेग की वृद्धि होवे। इस विद्या का जाननेवाला ही अच्छे प्रकार सुखों को प्राप्त होता है ॥१०॥
Reads 506 times

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

मधु - पान

Word-Meaning: - १. हे (नासत्या) - नासिका में विचरण करनेवाले, शरीर में असत्य को न आने देनेवाले प्राणापानो ! (आगच्छतम्) - आप यहाँ इस शरीर में हमें प्राप्त होवो । आपके ठीक कार्य करने पर ही, भूख - प्यास लगने पर हमसे (हविः) - यज्ञिय पवित्र भोज्य पदार्थ (हूयते) - इस शरीर में आहुत किये जाते हैं ; भोजन को भी हम एक यज्ञ का रूप देने का प्रयत्न करते हैं ।  २. हे प्राणपानो ! आप (मधुपेभिः आसभिः) - इन अन्नों के सारभूत सोम - [वीर्यकण] - रूप मधु का पान करनेवाले  अपने मुखों से (मध्वः पिबतम्) - इस सोम का पान करो । प्राणसाधना से यज्ञिय अन्नों से उत्पन्न सात्त्विक वीर्य की ऊर्ध्वगति होती है, यही अश्विनी देवों का सोमपान है ।  ३. हे प्राणापानो ! (युवोः) - आप दोनों के (चित्रम्) - इस अद्भुत अथवा संज्ञानवाले, ज्ञानरूप प्रकाशवाले (घृतवन्तम्) - [घृ क्षरणदीप्तयोः] नैर्मल्य व चमकवाले (रथम्) - शरीररूप रथ को (सविता) - वह प्रेरक प्रभु (उषसः पूर्वम्) - उषाकाल के अग्रभाग में ही, अर्थात् बहुत सवेरे - सवेरे (हि) - निश्चयपूर्वक (ऋताय) - यज्ञादि उत्तम कर्मों के लिए (इष्यति) - प्रेरित करता है, अर्थात् यह हमारा शरीर ज्ञानमय, निर्मल व स्वास्थ्य की दीप्तिवाला बनता है और सदा प्रातः से ही उत्तम कर्मों में लग जाता है ।   
Connotation: - भावार्थ - हम यज्ञिय भोजन खाएं, प्राणसाधना से सोम का रक्षण करें । सोमरक्षण से 'प्रकाश, नैर्मल्य व दृढ़ता' - वाले इस शरीर को सदा उत्तम कर्मों में व्याप्त रक्खें ।   
Reads 506 times

SWAMI DAYANAND SARSWATI

(आ) समन्तात् (नासत्या) अश्विनाविव। अत्र सुपां सुलुग् इत्याकारादेशः (गच्छतम्) (हूयते) क्षिप्यते दीप्यते (हविः) होतुं प्रक्षेप्तं दातुमर्हं काष्ठादिकमिन्धनम् (मध्वः) मधुरगुणयुक्तानि जलानि। मध्वित्युदकनामसु पठितम्। निघं० १।१२। अत्र लिंगव्यत्ययेन पुँस्त्वम्। वाच्छन्दसिसर्वे० इति पूर्वसवर्णप्रतिषेधा द्यणादेशः। (पिबतम्) (मधुपेभिः) मधूनि जलानि पिबन्ति यैस्तैः (आसभिः) स्वकीयैरास्यवच्छेदकगुणैः। अत्रास्यस्य स्थाने पदन्नोमासू०। अ० ६।१।६३। इत्यासन्नादेशः। (युवोः) युवयोः (हि) निश्चयार्थे (पूर्वम्) प्राक् (सविता) सूर्यलोकः (उषसः) सूर्योदयात्प्राक् वर्त्तमानकालवेलायाः (रथम्) रमणहेतुम् (ऋताय) सत्यगमनाय। ऋतमिति सत्यनामसु पठितम्। निघं० ३।१२। (चित्रम्) आश्चर्य्यवेगादियुक्तम् (घृतवन्तम्) घृतानि बहून्युदकानि विद्यन्ते यस्मिँस्तम्। घृतमित्युदकनामसु पठितम्। निघं० १।१२। (इष्यति) गच्छति ॥१०॥

Anvay:

पुनस्ताभ्यां किं साधनीयमित्युपदिश्यते।

Word-Meaning: - हे अश्विनौ नासत्याभ्यामश्विभ्यामिव युवाभ्यां यद्धविर्हूयते तेन हविषा शेधितानि मध्वो मधूनि जलानि मधुपेभिरासभिः पिबतम्। अस्मदानन्दाय घृतवन्तं चित्रं रथमागच्छतं समन्ताच्छीघ्रं प्राप्नुतं युवोर्युवयो र्यो रथ उषसः पूर्वं सवितेव प्रकाशमान इष्यति स ह्यतायास्माभिर्गृहीतव्यो भवति ॥१०॥
Connotation: - यदा यानेष्वग्निजले प्रदीप्य चालयन्ति तदेमानि यानानि स्थानान्तरं सद्यः प्राप्नुवन्ति। तत्र जलवाष्पनिस्सारणायैकमीदृशं स्थानं निर्मातव्यं यद्द्वारा बाष्पनिर्मोचनेन वेगो वर्द्धेत। एतद्विद्याऽभिज्ञ एव सम्यक् सुखं प्राप्नोति ॥१०॥
Reads 506 times

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Ashvins, high-priests of truth and nature, come, the input oblations are offered. Taste the honey sweets of your achievement with your honeyed lips. The sun itself before the dawn energises your wondrous paradisal chariot for the pursuit of truth and right.
Reads 506 times

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The same subject is continued.

Anvay:

O truthful expert artisans ! whatever fuel and oblations you put in the fire, drink the sweet and thereby purified water with lips that know the sweetness of all. Come for our delight to our pleasant dwelling place at the dawn before the rise of the sun with your wonderful chariot full of water etc. that sort of chariot or car is to be taken by us for true movement and speedy locomotion.

Word-Meaning: - [इवि:] होतुं प्रक्षेप्तुं दातुम् अर्ह काष्ठादिकम् इन्धनम् । = Anything to be put in the fire like the fuel. (मध्वः) मधुर गुणयुक्तानि जलानि = Sweet waters. मधुइति उदकनामसु पठितम् (निघ १.१२) अत्र लिंगव्यत्ययेन पुंस्त्वम् वा छन्दसि सर्वे विधयो भवन्तीति पूर्वसवर्णप्रतिषेधाद् यणादेशः (आसभिः) स्वकीयैः आस्यवत् छेदक गुणैः अत्रास्यस्य स्थाने पछन्मोमास (अष्ट० ६.१.६३ ) इत्यासन्नादेशः
Connotation: - When fire and water are put in proper proportion and duly combined in the vehicles, they take us soon to distant places. There should be such a place for the exit of the steam, that the speed may be accelerated. He can enjoy happiness well who knows this science.
Reads 506 times

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - जेव्हा यानात जल व अग्नी प्रदीप्त करून ती चालविली जातात तेव्हा ती याने दुसऱ्या स्थानी ताबडतोब जातात. त्यात जल व वाफेचे ठिकाण असे असावे की वाफ निघाल्यामुळे वेगाची वृद्धी व्हावी. ही विद्या जाणणाराच चांगल्याप्रकारे सुख प्राप्त करतो. ॥ १० ॥