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त्वं नो॑ अग्ने स॒नये॒ धना॑नां य॒शसं॑ का॒रुं कृ॑णुहि॒ स्तवा॑नः। ऋ॒ध्याम॒ कर्मा॒पसा॒ नवे॑न दे॒वैर्द्या॑वापृथिवी॒ प्राव॑तं नः ॥

English Transliteration

tvaṁ no agne sanaye dhanānāṁ yaśasaṁ kāruṁ kṛṇuhi stavānaḥ | ṛdhyāma karmāpasā navena devair dyāvāpṛthivī prāvataṁ naḥ ||

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Pad Path

त्वम्। नः॒। अ॒ग्ने॒। स॒नये॑। धना॑नाम्। य॒शस॑म्। का॒रुम्। कृ॒णु॒हि॒। स्तवा॑नः। ऋ॒ध्याम॑। कर्म॑। अ॒पसा॑। नवे॑न। दे॒वैः। द्या॒वा॒पृ॒थि॒वी॒ इति॑। प्र। अ॒व॒त॒म्। नः॒ ॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:31» Mantra:8 | Ashtak:1» Adhyay:2» Varga:33» Mantra:3 | Mandal:1» Anuvak:7» Mantra:8


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर परमात्मा का उपासक प्रजा के वास्ते कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

Word-Meaning: - हे (अग्ने) कीर्त्ति और उत्साह के प्राप्त करानेवाले जगदीश्वर वा परमेश्वरोपासक ! (स्तवानः) आप स्तुति को प्राप्त होते हुए (नः) हम लोगों के (धनानाम्) विद्या सुवर्ण चक्रवर्त्ति राज्य प्रसिद्ध धनों के (सनये) यथायोग्य कार्य्यों में व्यय करने के लिये (यशसम्) कीर्त्तियुक्त (कारुम्) उत्साह से उत्तम कर्म करनेवाले उद्योगी मनुष्य को नियुक्त (कृणुहि) कीजिये, जिससे हम लोग नवीन (अपसा) पुरुषार्थ से (नित्य) नित्य बुद्धियुक्त होते रहें और आप दोनों विद्या की प्राप्ति के लिये (देवैः) विद्वानों के साथ करते हुए (नः) हम लोगों की और (द्यावापृथिवी) सूर्य प्रकाश और भूमि को (प्रावतम्) रक्षा कीजिये ॥ ८ ॥
Connotation: - मनुष्यों को परमेश्वर की इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये कि हे परमेश्वर ! आप कृपा करके हम लोगों में उत्तम धन देनेवाली सब शिल्पविद्या के जाननेवाले उत्तम विद्वानों को सिद्ध कीजिये, जिससे हम लोग उनके साथ नवीन-नवीन पुरुषार्थ करके पृथिवी के राज्य और सब पदार्थों से यथायोग्य उपकार ग्रहण करें ॥ ८ ॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

यशस्वी कर्ता

Word-Meaning: - १. हे अग्ने ! (स्तवानः) - स्तुति किये जाते हुए (त्वम्) - आप (नः) - हमें (धनानां सनये) - धनों की प्राप्ति के लिए (यशसं कारुम्) - यशस्वी व कलापूर्ण ढङ्ग से कार्यों को करनेवाला (कृणुहि) - बना दीजिए , अर्थात् हम प्रभुस्तवन करनेवाले बनें , प्रभुस्तवन करते हुए क्रियाशील बनें , प्रत्येक क्रिया को इस प्रकार से करें कि वह हमारे यश का कारण बने । यह यशस्वी कर्म हमारी धन - वृद्धि का कारण तो बनेगा ही ।  2. ऐसा होने पर (अपसा) - इन व्यापक कर्मों के द्वारा (नवेन) - [नु स्तुतौ , नवः स्तुति] स्तुति के द्वारा तथा (देवैः) - दिव्यगुणों के द्वारा (नः) हमें (द्यावापृथिवी) - मस्तिष्क व शरीर (प्रावतम्) - उत्तमता से रक्षित करनेवाले हों । 'मस्तिष्क' ज्ञान के द्वारा हमारा रक्षण करे तो 'शरीर' शक्ति के द्वारा हमें सुरक्षित करे , अर्थात् प्रभुकृपा से हमारे हाथों में कर्म हो , हृदय में प्रभुस्तवन हो , जीवन में दिव्यगुण हों और हमारे मस्तिष्क व शरीर क्रमशः ज्ञान व शक्ति से युक्त होकर हमें नाश से बचाएँ और अमृतत्व की ओर ले - चलें । 
Connotation: - भावार्थ - हम यशस्वीकर्ता बनकर धनलाभ करें , क्रियाशीलता को बढ़ाएँ तथा कर्म , स्तवन व दिव्यता के धारण द्वारा व शक्ति को अपना रक्षक बनाएँ । 
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तदुपासकः प्रजायै कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

Anvay:

हे अग्ने ! त्वं स्तवानः सन् नोऽस्माकं धनानां सनये संविभागाय यशसं कारुं कृणुहि सम्पादय, यतो वयं पुरुषार्थिनो भूत्वा नवेनापसा सह कर्म कृत्वा ऋध्याम नित्यं वर्द्धेम विद्याप्राप्तये देवैः सह युवां नोऽस्मान् द्यावापृथिवी च प्रावतं नित्यं रक्षतम् ॥ ८ ॥

Word-Meaning: - (त्वम्) जगदीश्वरोपासकः (नः) अस्माकम् (अग्ने) कीर्त्युत्साहप्रापक (सनये) संविभागाय (धनानाम्) विद्यासुवर्णचक्रवर्त्तिराज्यप्रसिद्धानाम् (यशसम्) यशांसि कीर्त्तियुक्तानि कर्माणि विद्यन्ते यस्य तम् (कारुम्) य उत्साहेनोत्तमानि कर्माणि करोति तम् (कृणुहि) कुरु। अत्र उतश्च प्रत्ययाच्छन्दो वा वचनम्। (अष्टा०६.४.१०६) अनेन वार्तिकेन हेर्लुक् न। (स्तवानः) यः स्तौति सः (ऋध्याम) वर्द्धेम (कर्म) क्रियमाणमीप्सितम् (अपसा) पुरुषार्थयुक्तेन कर्मणा सह। अप इति कर्मनामसु पठितम् । (निघं०२.१) (नवेन) नूतनेन। नवेति नवनामसु पठितम् । (निघं०३.२८) (देवैः) विद्वद्भिः सह (द्यावापृथिवी) भूमिसूर्यप्रकाशौ (प्र) प्रकृष्टार्थे (प्रावतम्) अवतो रक्षतम् (नः) अस्मान् ॥ ८ ॥
Connotation: - मनुष्यैरतेदर्थं परमात्मा प्रार्थनीयः। हे जगदीश्वर ! भवान् कृपयाऽस्माकं मध्ये सर्वासामुत्तमधनप्रापिकानां शिल्पादिविद्यानां वेदितॄनुत्तमान् विदुषो निर्वर्तय, यतो वयं तैः सह नवीनं पुरुषार्थं कृत्वा पृथिवीराज्यं सर्वेभ्यः पदार्थेभ्य उपकारांश्च गृह्णीयामेति ॥ ८ ॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni, lord giver of honour, sung and celebrated in hymns, for the management and growth of our wealth, give us a reputed expert of economy so that we may advance and prosper with new enterprises, and both heaven and earth may promote us with the blessings of nature and the environment.
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ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

How is God's devotee for the people is taught in the 8th Mantra.

Anvay:

O devotee of God, augmenter of fame and zeal, glorifying God, you should render illustrious and performer of good actions enthusiastically, every man among us for the proper and just distribution of wealth in the form of knowledge, gold and vast but good government, so that being industrious, we may grow with new enterprises along with enlightened persons, for the acquisition of knowledge, preserve and guard us and both the earth and the light of the sun.

Word-Meaning: - ( सनये ) संविभागाय = For good, proper or just distribution. (कारुम) यः उत्साहेन उत्तमानि कर्माणि करोति तम् = Performer of noble deeds with zeal. (अपसा) पुरुषार्थयुक्तेन कर्मणा सह = With an act done enthusiastically. अप इति कर्मनामसु पठितम् (निघ० २.१ ( द्यावापृथिवी) भूमिसूर्यप्रकाशौ = The earth and the light of the sun. ( धनानाम् ) विद्यासुवर्ण चक्रवर्तिराज्यप्रसिद्धानाम् = Of the wealth of various kinds consisting of knowledge gold and good and vast government.
Connotation: - Men should pray in the following manner:- O God, create among us such noble learned persons who are the knowers of all arts and sciences that lead to good wealth, so that we may be able to establish an admirable administration on earth by undertaking new enterprises and taking benefit from all substances.
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MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - माणसांनी परमेश्वराची या प्रकारे प्रार्थना केली पाहिजे की हे परमेश्वरा! कृपा करून आमच्यामध्ये उत्तम धन देणाऱ्या व शिल्पविद्या जाणणाऱ्या विद्वानांना नियुक्त कर. ज्यामुळे आम्ही त्यांच्याबरोबर नवनवीन पुरुषार्थ करून पृथ्वीचे राज्य व सर्व पदार्थांचा यथायोग्य उपयोग करून घ्यावा. ॥ ८ ॥