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त्वाम॑ग्ने प्रथ॒ममा॒युमा॒यवे॑ दे॒वा अ॑कृण्व॒न्नहु॑षस्य वि॒श्पति॑म्। इळा॑मकृण्व॒न्मनु॑षस्य॒ शास॑नीं पि॒तुर्यत्पु॒त्रो मम॑कस्य॒ जाय॑ते ॥

English Transliteration

tvām agne prathamam āyum āyave devā akṛṇvan nahuṣasya viśpatim | iḻām akṛṇvan manuṣasya śāsanīm pitur yat putro mamakasya jāyate ||

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Pad Path

त्वाम्। अ॒ग्ने॒। प्र॒थ॒मम्। आ॒युम्। आ॒यवे॑। दे॒वाः। अ॒कृ॒ण्व॒न्। नहु॑षस्य। वि॒श्पति॑म्। इळा॑म्। अ॒कृ॒ण्व॒न्। मनु॑षस्य। शास॑नीम्। पि॒तुः। यत्। पु॒त्रः। मम॑कस्य। जाय॑ते ॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:31» Mantra:11 | Ashtak:1» Adhyay:2» Varga:34» Mantra:1 | Mandal:1» Anuvak:7» Mantra:11


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर वह कैसा है और क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

Word-Meaning: - हे (अग्ने) विज्ञानयुक्त सभाध्यक्ष ! (देवाः) विद्वानों ने (नहुषस्य) मनुष्य की (आयवे) विज्ञानवृद्धि के लिये इस (इळाम्) वेदवाणी को (अकृण्वन्) प्रकाशित किया तथा (मनुष्यस्य) मनुष्यमात्र की (शासनीम्) सत्य शिक्षा को (अकृण्वन्) प्रकाशित किया और (यत्) जैसे (ममकस्य) हम लोग (पितुः) पिता होते हैं, उनका (पुत्रः) पुत्र अपने शील से पितृवर्ग को पवित्र करनेवाला (जायते) उत्पन्न होता है, वैसे राजवर्गों के प्रजाजन होते हैं ॥ ११ ॥
Connotation: - ईश्वरोक्त व्यवस्था करनेवाले वेद शास्त्र और राजनीति के विना प्रजा पालनेहारा सभापति राजा प्रजा नहीं पाल सकता है और प्रजा राजा के अज्ञ सन्तान के तुल्य होती है, इससे सभापति राजा पुत्र के समान प्रजा को शिक्षा देवे ॥ ११ ॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

विश्पति वा प्रजापालक राजा

Word-Meaning: - १. हे (अग्ने) - परमात्मन् ! (त्वाम्) - आपको ही (देवाः) - देवों ने (आयवे) उत्तम जीवन के लिए (प्रथमम् आयुम्) - 'पुरुरवा व उर्वशी' का उत्कृष्ट [प्रथम] पुत्र (अकृण्वन्) - बनाया , अर्थात् देव लोग अपने घरों में पति 'पुरुरवा' के रूप में और पत्नी 'उर्वशी' के रूप में हुए , अर्थात् पति खूब ही प्रभु का स्तवन करनेवाला बना और पत्नी अपने पर पूर्ण शासन करनेवाली बनी । इस प्रकार बनकर इन्होंने आपको ही जन्म दिया , अर्थात् प्रभु के प्रकाश को पाने का प्रयत्न किया । इससे इनका जीवन बड़ा ही सुन्दर बना । इसी बात को यहाँ आलंकारिक रूप में कहा गया कि इन्होंने प्रभु को ही अपना पुत्र बनाया ।  २. इस प्रकार जीवन के सौन्दर्य के लिए ही देवों ने (नहुषस्य) - [नह बन्धने] एक - दूसरे से बँधकर चलनेवाले मानव - समाज के (विश्पतिम्) - प्रजापालक राजा को (अकृण्वन्) - नियत किया । देवों ने प्रजाओं में से ही एक योग्य व्यक्ति को राजा के रूप में स्थापित किया ।  ३. इस राजा की अध्यक्षता में (इळाम्) - वेदवाणी को [इ+ला - a law] (मनुषस्य) - मनुष्य की (शासनीम्) - शासन करनेवाली (अकृण्वन्) - किया , अर्थात् यह राजा कोई मनमाना स्वच्छन्द शासन करनेवाला न था , यह वेदवाणी के अनुसार , अर्थात् प्रभु से वेद में प्रतिपादित व्यवस्था के अनुसार ही शासन करता था ।  ४. इस वैदिक शासन का ही यह परिणाम था (यत्) - कि (ममकस्य पितुः) - ममत्व व स्नेहवाले पिता का (पुत्रः) - जैसे पुत्र होता है उसी प्रकार राजा की यह प्रजा (जायते) - हो जाती है । राजा प्रजा को पुत्रवत् प्रेम करता हुआ उसकी उन्नति के लिए ही शासन करता है । 
Connotation: - भावार्थ - जीवन के उत्कर्ष के लिए गृहस्थ में पति - पत्नी प्रभु को अपना उत्कृष्ट पुत्र बनाएँ , अर्थात् प्रभु का अपने में प्रकाश करने का प्रयत्न करें । इस उत्तम स्थिति के लिए वेदानुकूल शासन करनेवाला , प्रजा को पुत्र समझनेवाला राजा नियत किया जाए । 
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनः स कीदृश किं कुर्यादित्युपदिश्यते ॥

Anvay:

हे अग्ने विज्ञानान्वितसभाध्यक्ष ! देवा नहुषस्यायव इमामिळामकृण्वन् विशदीमकुर्वन् मनुष्यस्य शासनीं सत्यशिक्षां चाकृण्वन्। प्रजा च यत्-यथा ममकस्य पितुः पुत्रो जायते तथा भवति ॥ ११ ॥

Word-Meaning: - (त्वाम्) प्रजापतिम् (अग्ने) विज्ञानान्वित (प्रथमम्) सर्वेष्वग्रगन्तारम् (आयुम्) य एति न्यायेन प्रजां तं (आयवे) यथा विज्ञानाय (देवाः) विद्वांसः (अकृण्वन्) कुर्युः। अत्र लिङर्थे लङ्। (नहुषस्य) मनुषस्य। नहुष इति मनुष्यनामसु पठितम् । (निघं०२.३) नहुषस्येत्यत्र सायणाचार्य्येण नहुषनामकराजविशेषो गृहीतस्तस्तदसत्। कस्यचिन्नहुषस्येदानींतनत्वाद् वेदानां सनातनत्वात् तस्य गाथात्र न सम्भवति निघण्टौ नहुषस्येति मनुष्यनाम्नः प्रसिद्धेश्च। (विश्पतिम्) विशां प्रजानां पतिं पालकं सर्वोत्तमं राजानम् (इळाम्) वेदचतुष्टयीं वाचम्। इळेति वाङ्नामसु पठितम् । (निघं०१.१९) (अकृण्वन्) कुर्युः (मनुषस्य) मनुष्यस्य। अत्र मन् धातोर्बाहुलकादुषन् प्रत्ययः। (शासनीम्) शास्ति सर्वान् विद्याधर्माचरणशीलान् यया सत्यनीत्या ताम्। अत्रापि सायणाचार्य्येण मनोः पुत्री गृहीता तदप्यशुद्धमेव। (पितुः) जनकस्य सकाशात् (यत्) यथा सुपां सुलुग्० इति तृतीयैकवचनस्य लुक्। (पुत्रः) यः पितृपावनशीलः (ममकस्य) मादृशस्य। अत्र बाहुलकान् मन्धातोर्दमकन् प्रत्ययः। (जायते) उत्पद्यते ॥ ११ ॥
Connotation: - नैवेश्वरप्रणीतेन व्यवस्थापकेन वेदशास्त्रेण राजनीत्या च विना प्रजापालक प्रजां पालयितुं शक्नोति, प्रजाजनश्च राज्ञोऽज्ञसन्तानवद्भवत्यतः सभापती राजाज्ञपुत्रमिव प्रजां शिष्यात् ॥ ११ ॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni, lord of light and life, ruler, sustainer and protector of the people, brilliant powers of nature manifest you, brilliant men of knowledge and generosity elect and kindle you, first power, leading light and protector of the people for their life, enlightenment and advancement. They envision, proclaim and disseminate the divine voice, eternal truth and ruling law of the world and humanity. And, as in my case, the son is born of the father, so is light and knowledge born of parental light and knowledge.
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ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

What also should they (the teachers and the taught) do is told in the 11th Mantra.

Anvay:

O Ye men, being established in the conduct full of forgiveness and endurance, you should lovingly listen to these my words which are refined on account of the noble Vedic teaching, in order to see God who is worthy of being realized by all wise men and also to visualize charming aero planes and other suitable vehicles for your happiness.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - Because it is not possible to know God and the nature of the vehicles manufactured with the help of the arts and sciences without personal contact in the form of questions and answers with the learned persons of forgiving sweet nature, therefore men should always acquire such knowledge with the assistance of the wise.
Footnote: (विश्वदर्शतम्) सर्वैर्विद्वद्भिः द्रष्टव्यं जगदीश्वरम् | = To God who must be seen (realized) by all wise men. ( दर्शम्) पुनः पुनद्रष्टुम् | = To see or realize again and again.(रथम्) रमणीयं विमानादियानम् । = Charming vehicles like the aero plane etc. ( क्षमि) क्षाम्यन्ति सहन्ते जना यस्मिन् व्यवहारे तस्मिन् स्थित्वा । अत्र कृतो बहुलम् इति करणे क्विप् । वा छन्दसि सर्वे विधयो भवन्तीत्यनुनासिकस्य क्विब् झलोरिति दीर्घो न भवति ॥ दर्शतः-दृशेः भृम दृशियजिपर्वि पयमितमिनमि हर्य्यिभ्योऽतच् ( उणा० ३.११० ) इति अतच् प्रत्ययः । = Worth seeing. ( रथः ) रहतेर्गतिकर्मण: स्थिरतेर्वा स्याद् विपरीतस्य रममाणोऽस्मिंस्तिष्ठतीति वा (रमु-क्रीडायाम् इति धातोः) रणतेर्वा रसतेर्वा (निरुक्ते ९.११ ) ।। = Charming or beautiful vehicle. ( क्षमि ) Rishi Dayananda's interpretation given above is based upon the root meaning of क्षमूष-सहने to endure or forgive. Other commentators have generally interpreted it as 'on earth' depending on क्षमेति पृथिवी नामसु ( निघ० १.१ ) But they to have change क्षमि into क्षमायाम् as Sayanacharya,Shri Kapali Shastri and others have done. क्षमि क्षमायाम् (आतोऽभाव: छान्स इति श्री कपालि शास्त्रिरण:) Though Shri Kapali Shastri explains all these Mantras of a modern (belonging to a particular time) person in the Vedas. This interpretation is opposed to the Vedic Lexicon highantn also where the word नहुष stands a for men in general. नहुषइति मनुष्य नामसु पठितम् ( निघ० २.३) The second blunder committed by Sayanacharya is regarding the interpretation of इडा Sayanacharya interprets it as the daughter of Manu saying. मनुषस्य - मनोः इलाम्-एतन्नामधेयां पुत्रीम् ।। or the daughter of Manu. Rishi Dayananda rightly rejects this interpretation saying अपि सायणाचार्येण मनो: पुत्री गृहीता तदप्यशुद्धमेव । i. e. Sayanacharya has taken इडा to mean the daughter of Manu which is wrong. The word इडा has been interpreted in the Vedic Lexicon Nighantu as इडेति वाङनामसु पठितम् ( निघ० १. ११ ) = Ida means (Vedic) Speech. As has been pointed out before, the Vedas being eternal, can not have historical references. This interpretation given by Sayanacharya is opposed to his own introduction to the Rigveda commentary based upon the aphorism of the meemansa like आख्या-प्रवचनान् परन्तु श्रुतिसामान्यमात्रम् and others.
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MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - ईश्वरोक्त व्यवस्था करणाऱ्या वेदशास्त्र व राजनीतीशिवाय प्रजेचे पालन करणारा सभापती राजा प्रजेचे पालन करू शकत नाही. प्रजा राजाच्या अज्ञ संतानांप्रमाणे असते. त्यासाठी सभापती राजाने पुत्राप्रमाणे प्रजेला शिक्षित करावे. ॥ ११ ॥