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यद॒पामोष॑धीनां परिं॒शमा॑रि॒शाम॑हे। वाता॑पे॒ पीब॒ इद्भ॑व ॥

English Transliteration

yad apām oṣadhīnām pariṁśam āriśāmahe | vātāpe pīva id bhava ||

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Pad Path

यत्। अ॒पाम्। ओष॑धीनाम्। प॒रिं॒शम्। आ॒ऽरि॒शाम॑हे। वाता॑पे। पीबः॑। इत्। भ॒व॒ ॥ १.१८७.८

Rigveda » Mandal:1» Sukta:187» Mantra:8 | Ashtak:2» Adhyay:5» Varga:7» Mantra:3 | Mandal:1» Anuvak:24» Mantra:8


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

Word-Meaning: - हे (वातापे) पवन के समान सर्वपदार्थ व्यापक परमेश्वर ! हम लोग (अपाम्) जलों और (ओषधीनाम्) सोमादि ओषधियों के (यत्) जिस (परिंशम्) सब ओर से प्राप्त होनेवाले अन्न में विद्यमान अंश को (आरिशामहे) अच्छे प्रकार प्राप्त होते हैं उससे आप (पीबः) उत्तम वृद्धि करनेवाले (इत्) ही (भव) हूजिये ॥ ८ ॥
Connotation: - जल, अन्न और घृत के संस्कार से प्रशंसित अन्न और व्यञ्जन इलायची, मिरच वा घृत, दूध पदार्थों को उत्तम बनाकर उन पदार्थों के भोजन करनेवाले जन युक्त आहार और विहार से पुष्ट होवें ॥ ८ ॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

जल व वनस्पति

Word-Meaning: - १. (यत्) = जब (अपाम्) = जलों के व (ओषधीनाम्) = ओषधियों के परिंशम् [परिलेशम् सा०] अंश को-मात्रा में प्रयोग को (अरिशामहे) = आस्वादित करते हैं, रुचिपूर्वक ग्रहण करते हैं तो हे (वातापे) = [वातेन आप्यायते] वायु से आप्यायित होनेवाले शरीर ! (इत्) = निश्चय से (पीव: भव) = आप्यायित होनेवाला हो। २. मुख्यतया शरीर का धारण वायु पर निर्भर करता है, अतः शरीर 'वातापि' कहलाता है। इस शरीर के आप्यायन के लिए जल व वनस्पतियों का प्रयोग ही श्रेयस्कर है। इनका प्रयोग भी (उचित) मात्रा में करना ही ठीक है। 'अरिशामहे' शब्द से यह भी स्पष्ट है कि इनका प्रयोग भी आस्वाद के साथ करना है। रुचि से ग्रहण किया हुआ अन्न उत्तम धातुओं का निर्माण करनेवाला होता है।
Connotation: - भावार्थ - जल व ओषधियों के मात्रा में प्रयोग से हम शरीर को आप्यायित करें।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह ।

Anvay:

हे वातापे परमेश्वर वयमपामोषधीनां यत्परिंशमन्नमारिशामहे तेन त्वं पीब इद्भव ॥ ८ ॥

Word-Meaning: - (यत्) अन्नम् (अपाम्) जलानाम् (ओषधीनाम्) सोमाद्योषधीनाम् (परिंशम्) परितः सर्वतोंऽशं लेशम्। अत्र छान्दसो वर्णलोपो वेत्यलोपः। (आरिशामहे) समन्तात् प्राप्नुयाम। अत्र लिश गतावित्यस्य वर्णव्यत्ययेन लस्य स्थाने रेफादेशः। (वातापे) वातइव सर्वान् पदार्थान् व्याप्नोति तत्सम्बुद्धौ (पीबः) वृद्धिकरः (इत्) एव (भव) ॥ ८ ॥
Connotation: - जलान्नघृतसंस्कारेण प्रशस्तान्यन्नानि व्यञ्जनानि निर्माय भोक्तारो युक्ताहारविहारेण पुष्टा भवन्तु ॥ ८ ॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - When to our heart’s content we have eaten of the gift of herbs and waters, then, O universal energy pervasive of food, be with us, kind and gracious, for our growth and advancement (not for corpulence).

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The significance of good meals.

Anvay:

O God pervading in all objects like the air be giver of strength to us, because we enjoy the plenty of Waters and the herbs.

Word-Meaning: - NA
Connotation: - The persons who partakes of well-cooked meals with proportionate water, butter and other vegetables would become ´robust by taking meals at regular intervals.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - जल, अन्न व घृताच्या संस्काराने प्रशंसित अन्न व निरनिराळी व्यंजने बनवून भोजन करणाऱ्या लोकांनी युक्त आहार-विहाराने पुष्ट व्हावे. ॥ ८ ॥