पृ॒थू रथो॒ दक्षि॑णाया अयो॒ज्यैनं॑ दे॒वासो॑ अ॒मृता॑सो अस्थुः। कृ॒ष्णादुद॑स्थाद॒र्या॒३॒॑ विहा॑या॒श्चिकि॑त्सन्ती॒ मानु॑षाय॒ क्षया॑य ॥
pṛthū ratho dakṣiṇāyā ayojy ainaṁ devāso amṛtāso asthuḥ | kṛṣṇād ud asthād aryā vihāyāś cikitsantī mānuṣāya kṣayāya ||
पृ॒थुः। रथः॑। दक्षि॑णायाः। अ॒यो॒जि॒। आ। एन॑म्। दे॒वासः॑। अ॒मृता॑सः। अ॒स्थुः॒। कृ॒ष्णात्। उत्। अ॒स्था॒त्। अ॒र्या॑। विऽहा॑याः। चिकि॑त्सन्ती। मानु॑षाय। क्षया॑य ॥ १.१२३.१
SWAMI DAYANAND SARSWATI
अब १२३ एकसौ तेईसवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में स्त्री-पुरुष के विषय को कहते हैं ।
HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
१. (दक्षिणायाः) = दोषों के दहनरूप अपने व्यापार में कुशल अथवा [दक्ष - to grow] उन्नति की कारणभूत उषा का (पृथुः) = विस्तृत (रथः) = रथ (अयोजि) = जोता गया है । (एनम्) = इस रथ पर (देवासः) = देव व (अमृतासः) = अमृत पुरुष (आ अस्थुः) = सब प्रकार से आरूढ़ होते हैं । इस रथ पर जो भी आरूढ़ होते हैं, वे देव व अमृत बनते हैं । मस्तिष्क में दीसिमय [दीपनात्] व मन में त्यागवृत्ति से युक्त [दानात्] पुरुष ही देव हैं । शरीर में रोगों से आक्रान्त न होनेवाले ही अमृत हैं । उषाकाल के आने से पूर्व ही जाग जानेवाले तथा उषाकाल के आने पर दैनिक कार्यक्रम के लिए समुद्यत हो जानेवाले पुरुष ही उषा के रथ पर आरूढ़ होते हैं । इस समय से पूर्व जाग जानेवाले ये पुरुष अपने शरीर - रथ को विस्तृत शक्तियोंवाला बना पाते हैं । २. यह (अर्या) = सब सुखों की स्वामिनी उषा (विहायाः) = विशिष्ट गतिवाली है अथवा महान् है [विहायः यहः महान्] (कृष्णात्) = कृष्ण वर्णवाले अन्धकार से (उद् अस्थात्) = ऊपर उठती है और (मानुषाय) = मनुष्य सम्बन्धी (क्षयाय) = [क्षि निवासगत्योः] उत्तम निवास व गति के लिए (चिकित्सन्ती) = सब रोगों व मलों का अपनयन करती है । उषाकाल में जागकर अपना शोधन, स्नान, सन्ध्या, हवन व स्वाध्याय करनेवाले व्यक्ति अपने जीवन को उत्तम बनाते हैं । उषा सब दोषों का दहन करके जीवन को सुन्दर बना देती है ।
SWAMI DAYANAND SARSWATI
अथ दम्पत्योर्विषयमाह ।
या मानुषाय क्षयाय चिकित्सन्ती विहाया अर्या उषाः कृष्णादुदस्थादिव विदुषाऽयोजि सा चैनं पतिं च युनक्ति ययोर्दक्षिणायाः पृथूरथश्चरति तावमृतासो देवास आऽस्थुः ॥ १ ॥
DR. TULSI RAM
ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA
The duties of the husband and wife are told in the hymn.
A noble lady great on account of her virtues and healing the diseases and bringing health to human beings while living at home, queen of the house rises, above darkness (of ignorance) like the Dawn as yoked in the Chariot of the house hold life by her learned husband and she yokes him for co-operation. Her spacious chariot has been harnessed from the southern direction or right-side and great scholars who regard themselves, as immortal (owing to the immortality of their soul) and who are endowed with Divine virtues ascend it.
MATA SAVITA JOSHI
या सूक्तात प्रभातवेळेच्या दृष्टान्ताबरोबर स्त्रियांच्या धर्माचे वर्णन करण्याने या सूक्तात सांगितलेल्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे.
