जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।
Word-Meaning: - (माता) निर्मात्री [पृथिवी] ने (ऋते) जल में [वर्तमान] (पितरम्) रक्षक [सूर्य] को (आ) मर्यादापूर्वक (बभाज) पृथक् किया, (हि) क्योंकि वह [पृथिवी] (अग्रे) पहिले [ईश्वरीय] (धीती) आधार और (मनसा) विज्ञान के साथ [सूर्य से] (सम् जग्मे) मिली हुई थी। [फिर] (सा) वह [पृथिवी, सूर्य] (बीभत्सुः) बन्धन की इच्छा करनेवाली (गर्भरसा) रस [जलादि, उत्पादन समर्थ्य] को गर्भ में रखनेवाली और (निविद्धा) नियम अनुसार ताड़ी गयी [दूर हटाई गयी थी] [इसी प्रकार] (नमस्वन्तः) झुकाव रखनेवाले [सूर्य का आकर्षण रखनेवाले दूसरे लोक] (इत्) भी (उपवाकम्) वाक्य अवस्था [पिण्ड बनने से नाम, स्थान आदि] को (ईयुः) प्राप्त हुए ॥८॥
Connotation: - प्रलय में सब पदार्थ परमाणुरूप से प्रकृति में लीन रहते हैं। सृष्टि में पहिले जल होता है, सूर्य और पृथिवी एक पिण्ड में मिले रहते हैं, फिर दोनों अलग-अलग हो जाते हैं। पृथिवी और सूर्य की पृथक्ता और आकर्षण से वर्षा, शीत और ग्रीष्म ऋतुएँ संसार को सुख पहुँचाते रहते हैं। यही नियम सूर्यलोक सम्बन्धी दूसरे लोकों का है ॥८॥ मनु भगवान् कहते हैं-अध्याय १। श्लोक ८, ९ ॥ सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः। अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् ॥१॥ तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम्। तस्मिञ्जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥२॥ उस [परमात्मा] ने अपने शरीर [सत्ता] से नाना प्रकार की प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा करके ध्यानमात्र से पहिले जल उत्पन्न किया, उस में बीज को छोड़ दिया ॥१॥ वह [बीज] चमकीला सहस्रों किरणों से पूर्ण प्रकाशवाला अण्डा हुआ, उस [अण्डे] में ब्रह्मा [परमात्मा] सब लोकों का पितामह अपने आप प्रकट हुआ [सब सृष्टि का आदि कारण परमात्मा ही जान पड़ा] ॥२॥