जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।
Word-Meaning: - (अविजानन्) अविज्ञानी (पाकः) रक्षा के योग्य [बालक] मैं (देवानाम्) विद्वानों के (मनसा) मनन के साथ (निहिता) रक्खे हुए (एना) इन (पदानि) पदों [पदचिह्नों] को (पृच्छामि) पूँछता हूँ। (कवयः) बुद्धिमानों ने (बष्कये) चलने योग्य (वत्से) निवासस्थान [संसार] के बीच (सप्त) [अपने] सात (तन्तून्) तन्तुओं [फैले हुए तन्तुरूप इन्द्रियों, त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, नाक, मन और बुद्धि] को (अधि) अधिक-अधिक (ओतवै) बुनने के लिये (उ) ही (वि) विविध प्रकार (तत्निरे) फैलाया था ॥६॥
Connotation: - विनीत ब्रह्मचारी जन आचार्यों से उन वेदविहित मार्गों को खोजें, जिन पर महात्माओं ने चल कर उन्नति की और उत्तराधिकारियों के लिये आगे बढ़ने का उदाहरण छोड़ा है ॥६॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में ५ वाँ है, (तत्निरे) के स्थान पर वहाँ [तत्रिरे] है ॥