Go To Mantra
Viewed 122 times

ये अ॒र्वाञ्च॒स्ताँ उ॑ परा॑च आहु॒र्ये परा॑ञ्च॒स्ताँ उ॑ अ॒र्वाच॑ आहुः। इन्द्र॑श्च॒ या च॒क्रथुः॑ सोम॒ तानि॑ धु॒रा न यु॒क्ता रज॑सो वहन्ति ॥

Mantra Audio
Pad Path

ये । अर्वाञ्च: । तान् । ऊं इति । पराच: । आहु: । ये । पराञ्च: । तान् । ऊं इति । अर्वाच: ।आहु: । इन्द्र: । च । या । चक्रथु: । सोम । तानि । धुरा । न । युक्ता । रजस: । वहन्ति ॥१४.१९॥

Atharvaveda » Kand:9» Sukta:9» Paryayah:0» Mantra:19


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।

Word-Meaning: - [इस चक्ररूप संसार में] (ये) जो [लोक] (अर्वाञ्चः) नीचे जानेवाले हैं, (तान् उ) उन्हीं को (पराचः) ऊपर जानेवाले (आहुः) कहते हैं, और (ये) जो (पराञ्चः) ऊपर जानेवाले हैं (तान् उ) उन्हीं को (अर्वाचः) नीचे जानेवाले (आहुः) कहते हैं। (इन्द्रः) हे परमेश्वर ! (च) और (सोम) हे जीवात्मा ! (या) जिन [व्रतों] को (चक्रथुः) तुम दोनों ने बनाया था, (तानि) वे [व्रत] संसार को (वहन्ति) ले चलते हैं, (न) जैसे (धुरा) धुर [जूए] से (युक्ताः) जुते हुए [घोड़े आदि, रथ को ले चलते हैं] ॥१९॥
Connotation: - जैसे ईश्वर के आकर्षण और धारण विशेष से सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, नक्षत्र आदि एक दूसरे से ऊँचे वा नीचे दिखाई देते हैं, वैसे ही जीव भी अपने कर्मों के अनुसार ईश्वरनियम से एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँचे-नीचे होते हैं। यह संसार इसी नियम पर चल रहा है, जैसे जूए में जुते घोड़े आदि से रथ चलता है ॥१९॥
Footnote: १९−(ये) लोकाः (अर्वाञ्चः) अवर+अञ्चु गतिपूजनयोः−क्विन्, अर्वादेशः। अधोगामिनः (तान्) (उ) एव (पराचः) पर+अञ्चु−क्विन्। उपरिगामिनः (आहुः) कथयन्ति (ये) (पराञ्चः) उपरिगताः (तान्) (उ) एव। वितर्के-द० (अर्वाचः) अधोगतान् (आहुः) (इन्द्रः) सम्बुद्धौ सुः। हे परमेश्वर (या) व्रतानि (चक्रथुः) युवां कृतवन्तौ (सोम) अ० १।६।२। सोमः सूर्यः प्रसवनात्, सोम आत्माप्येतस्मादेव-निरु० १४।१२। हे जीवात्मन् (तानि) व्रतानि (धुरा) धुर्वी हिंसायाम्−क्विप्, यद्वा, धारयतेः−क्विप्, आकारस्य उकारः। यानमुखेन, भारेण सह (न) इव (युक्ताः) सम्बद्धा अश्वादयः−(रजसः) द्वितीयार्थे षष्ठी। रजः। लोकम् (वहन्ति) चालयन्ति ॥