Go To Mantra

अ॒वः परे॑ण प॒र ए॒नाव॑रेण प॒दा व॒त्सं बिभ्र॑ती॒ गौरुद॑स्थात्। सा क॒द्रीची॒ कं स्वि॒दर्धं॒ परा॑गा॒त्क्व स्वित्सूते न॒हि यू॒थे अ॒स्मिन् ॥

Mantra Audio
Pad Path

अव: । परेण । पर: । एना । अवरेण । पदा । वत्सम् । बिभ्रती । गौ: । उत् । अस्थात् । सा । कद्रीची । कम् । स्वित् । अर्धम् । परा । अगात् । क्व । स्वित् । सूते । नहि । यूथे । अस्मिन् ॥१४.१७॥

Atharvaveda » Kand:9» Sukta:9» Paryayah:0» Mantra:17


Reads 68 times

PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।

Word-Meaning: - (वत्सम्) [निवासस्थान] देह को (बिभ्रती) धारण करती हुई (गौः) गौ [गतिशील जीवरूप शक्ति] (परेण) ऊँचे (पदा) पद [अधिकार वा मार्ग] से (अवः) नीचे को, और (एना) इस (अवरेण) नीचे [पद] से (परः) ऊपर को (उत् अस्थात्) उठी है। (सा) वह [जीवरूप शक्ति] (कद्रीची) किस ओर चलती हुई, (कं स्वित्) कौन से (अर्धम्) ऋद्धिवाले [अर्थात् परमेश्वर] को (परा) पराक्रम से (अगात्) पहुँची है, (क्व स्वित्) कहाँ पर (सूते) उत्पन्न होती है, (अस्मिन्) इस [देहधारी] (यूथे) समूह में तो (नहि) नहीं [उत्पन्न होती] ॥१७॥
Connotation: - मनुष्य को सदा विचारना चाहिये कि हमारे पूर्वज कैसे उच्च गति से नीच गति को और नीच गति से उच्च गति को पहुँचे। आत्मा किस उत्तम मार्ग पर चलकर समृद्धिशाली परमात्मा को पहुँचता है, यह सूक्ष्म आत्मा देह से नहीं उत्पन्न होता, फिर कहाँ से आता है ॥१७॥ (अस्मिन्) के स्थान पर ऋग्वेद मन्त्र १७ में [अन्तः] पद है ॥
Footnote: १७−(अवः) अवस्तात्। अधोदेशे (परेण) श्रेष्ठेन (परः) परस्तात् उपरिदेशे (एना) एनेन। अनेन (अवरेण) अधमेन (पदा) पदेन, अधिकारेण, मार्गेण (वत्सम्) वृतॄवदिवचिवसि०। उ० ३।६२। वस निवासे-स। निवासस्थानं देहम् (बिभ्रती) धरन्ती (गौः) गाव इन्द्रियाणि-निरु० १४।१५। गतिशीला जीवरूपा शक्तिः (उत्) उत्कर्षेण (अस्थात्) स्थितवती (सा) गौः (कद्रीची) ऋत्विग्दधृक्०। पा० ३।२।५९। किम्+अञ्चु गतिपूजनयोः−क्विन्। छन्दसि स्त्रियां बहुलम्। वा० पा० ६।३।९२। किं शब्दस्य टेरद्र्यादेशः। उगितश्च। पा० ४।१।६। ङीप्। अचः। पा० ६।४।१३८। अकारलोपः। चौ। पा० ६।३।१३८। इति दीर्घः। क्व गता सती (कं स्वित्) (अर्धम्) ऋधु वृद्धौ-घञ्। ऋद्धिशालिनं परमेश्वरम् (परा) पराक्रमेण (अगात्) अगमत्। गच्छति-द० (क्व) कुत्र (स्वित्) (सूते) सूयते, उत्पद्यते (नहि) निषेधे (यूथे) समूहे (अस्मिन्) ॥