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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
अतिथि के सत्कार का उपदेश।
Word-Meaning: - (तस्मै) उस [गृहस्थ] के लिये (उद्यन्) उदय होता हुआ (सूर्यः) सूर्य (हिङ्) तृप्ति कर्म (कृणोति) करता है, (संगवः) किरणों से संगतिवाला [दोपहर से पहिले सूर्य] (प्र) अच्छी भाँति (स्तौति) स्तुति करता है। (मध्यन्दिनः) मध्याह्नकाल (उत् गायति) उद्गीथ [वेदगान] करता है, (अपराह्णः) तीसरा पहर (निधनम्) निधि (प्रति) प्रत्यक्ष (हरति) प्राप्त कराता है और (अस्तंयन्) डूबता हुआ [सूर्य, निधि प्रत्यक्ष प्राप्त कराता है]। [उसके लिये] (भूत्याः) वैभव का, (प्रजायाः) प्रजा.... म० १-३ ॥४, ५॥
Connotation: - मनुष्य विद्वान् अतिथियों के सत्सङ्ग से पुरुषार्थ करके सब काल में आनन्द करता है ॥४, ५॥
Footnote: ४, ५−(तस्मै) गृहस्थाय (उद्यन्) उद्गच्छन् (सूर्यः) (संगवः) गोरद्धितलुकि। पा० ५।४।९२। सम्+गो-टच्। गोभिः किरणैः सङ्गतो मध्याह्नपूर्वः सूर्यः (मध्यन्दिनः) अ० ४।११।१२। मध्याह्नः (अपराह्णः) पूर्वापराधरो०। पा० २।२।१। इति समासः। राजाहःसखिभ्यष्टच्। पा० ५।४।९१। टच्। अह्नोऽह्न एतेभ्यः। पा० ५।४।८८। अह्नादेशः। अह्नोऽदन्तात्। पा० ८।४।७। णत्वम्। रात्राह्नाहाः पुंसि। पा० २।४।२९। इति पुंस्त्वम्। दिनस्य तृतीयभागः (अस्तंयन्) अदर्शनं प्राप्नुवन् सूर्यः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
