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नि॒धनं॒ भूत्याः॑ प्र॒जायाः॑ पशू॒नां भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥

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Pad Path

निऽधनम् । भूत्या: । प्रऽजाया: । पशूनाम् । भवति । य: । एवम् । वेद ॥१०.३॥

Atharvaveda » Kand:9» Sukta:6» Paryayah:5» Mantra:3


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

अतिथि के सत्कार का उपदेश।

Word-Meaning: - (तस्मै) उस [गृहस्थ] के लिये (उषाः) उषा [प्रभातवेला] (हिङ्) तृप्ति कर्म (कृणोति) करती है, (सविता) प्रेरणा करनेवाला सूर्य (प्र) अच्छी भाँति (स्तौति) स्तुति करता है। [उसके लिये] (बृहस्पतिः) बड़े सोम [अमृत रस] का रक्षक, वायु (ऊर्जया) प्राण शक्ति के साथ (उत् गायति) उद्गीथ [वेदगान] करता है, (त्वष्टा) [अन्न आदि] उत्पन्न करनेवाला, मेघ (पुष्ट्या) पुष्टि के साथ (निधनम्) निधि (प्रति) प्रत्यक्ष (हरति) प्राप्त कराता है और (विश्वे) सब (देवाः) उत्तम गुणवाले पदार्थ [निधि प्रत्यक्ष प्राप्त कराते हैं]। [उस गृहस्थ के लिये] (भूत्याः) वैभव का, (प्रजायाः) प्रजा [सन्तान भृत्य आदि] का और (पशूनाम्) पशुओं [गौ, घोड़े, हाथी आदि] का (निधनम्) निधि (भवति) होता है, (यः) जो गृहस्थ (एवम्) इस प्रकार (वेद) जानता है ॥१, २, ३॥
Connotation: - जो मनुष्य पूर्वोक्त विधि से विद्वानों का सत्कार करता है, उसको सब कालों में सब पदार्थों से आनन्द मिलता है ॥१, २, ३॥
Footnote: १, २, ३−(तस्मै) गृहस्थाय (उषाः) प्रभातवेला (हिङ्) ऋत्विक्दधृक्०। पा० ™३।२।५९। इति बाहुलकात्। हिवि प्रीणने−क्विन्, इति हिन्व्। स्वमोर्नपुंसकात्। पा० ७।१।२३। अमो लुक्। संयोगान्तस्य लोपः। पा० ८।२।२३। वलोपः। क्विन्प्रत्ययस्य कुः। पा० ८।२।६२। इति सानुनासिकं कुत्वम्। हिन्वति प्रीणातीति हिङ्। प्रीणनम्। तृप्तिकर्म (कृणोति) करोति (सविता) प्रेरकः सूर्यः (प्र) प्रकर्षेण (स्तौति) प्रशंसति (बृहस्पतिः) अ० १।८।२। मध्यस्थानदेवतात्वात्-निरु० १०।११। बृहतः सोमरसस्य पाता रक्षिता वायुः (ऊर्जया) प्राणशक्त्या (उत् गायति) उद्गीथं वेदगानं करोति (त्वष्टा) अ० २।५।६। त्वक्षतेः करोति कर्मणः−तृन्। मध्यस्थानदेवतात्वात्-निरु० १०।३४। अन्नादीनां कर्ता मेघः (पुष्ट्या) पोषणेन (प्रति) प्रत्यक्षम् (हरति) प्रापयति (विश्वे) सर्वे (देवाः) उत्तमगुणाः पदार्थाः (निधनम्) कॄपॄवृजिमन्दिनिधाञः क्युः। उ० २।८१। निदधातेः−क्यु। नितरां धारणम्। निधिम् (भूत्याः) वैभवस्य (प्रजायाः) सन्तानभृत्यादेः (पशूनाम्) गवाश्वगजादीनाम् (भवति) वर्तते (यः) (एवम्) पूर्वोक्तप्रकारेण (वेद) जानाति ॥