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याव॑द्द्वादशा॒हेने॒ष्ट्वा सुस॑मृद्धेनावरु॒न्द्धे ताव॑देने॒नाव॑ रुन्द्धे ॥

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यावत् । द्वादशऽअहेन । इष्ट्वा । सुऽसमृध्देन । अवऽरुन्ध्दे । तावत् । एनेन । अव । रुन्ध्दे ॥९.८॥

Atharvaveda » Kand:9» Sukta:6» Paryayah:4» Mantra:8


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

अतिथि के सत्कार का उपदेश।

Word-Meaning: - (यः) जो [गृहस्थ] (एवम्) ऐसा (विद्वान्) विद्वान् है, (सः) वह (मांसम्) मननसाधक [बुद्धिवर्धक वस्तु] को (उपसिच्य) सिद्ध करके (उपहरति) भेंट करता है। (यावत्) जितना [फल] (सुसमृद्धेन) बड़ी सम्पत्तिवाले (द्वादशाहेन) बारह दिनवाले [सोमयाग] से (इष्ट्वा) यज्ञ करके (अवरुन्द्धे) [मनुष्य] पाता है, (तावत्) उतना [फल] (एनेन) इस [कर्म] से (अवरुन्द्धे) वह [विद्वान्] पाता है ॥७, ८॥
Connotation: - जैसे मनुष्य बड़े-बड़े यज्ञों के करने से संसार का उपकार करके सुख पाता है, वैसे ही विद्वान् गृहस्थ विद्वान् अतिथियों के सत्सङ्ग से लाभ उठाकर आनन्द भोगता है ॥७, ८॥
Footnote: ७, ८−(मांसम्) अ० ९।६(३)।९। मननसाधकं ज्ञानवर्धकं वस्तु (द्वादशाहेन) राजाहःसखिभ्यष्टच्। पा० ५।४।९१। द्वादशानामह्नां समाहारो यस्मिन् क्रतौ स क्रतुर्द्वादशाहः। द्वादशदिनसिद्धसोमयज्ञेन। अन्यत् पूर्ववत् ॥