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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
अतिथि के सत्कार का उपदेश।
Word-Meaning: - (यः) जो (अतिथीनाम्) अतिथियों, [उत्तम संन्यासियों] का [सङ्ग है], (सः) वह [संन्यासियों के लिये] (आहवनीयः) आहवनीय [ग्राह्य अग्नि है, जिसमें ब्रह्मचर्य आश्रम में ब्रह्मचारी होम करते हैं], और (यः) जो (वेश्मनि) घर में [अर्थात् अपने आश्रम में निवास है], (सः) वह [उसके लिये] (गार्हपत्यः) गार्हपत्य [गृहसम्बन्धी अग्नि है] और (यस्मिन्) जिसमें [अर्थात् जिस जाठराग्नि में अन्न आदि] (पचन्ति) पचाते हैं, (सः) वह [संन्यासियों के लिये] (दक्षिणाग्निः) दक्षिणाग्नि [अनुकूल अग्नि वानप्रस्थ सम्बन्धी है] ॥१३॥
Connotation: - संन्यासी अपने आत्मा में सब अग्नियों का आरोपण करके सब आश्रमों का हित करता है ॥१३॥
Footnote: १३−(यः) सङ्गः (अतिथीनाम्) विदुषां संन्यासिनाम् (सः) सङ्गः (आहवनीयः) अ० ८।१०।(१)।४। ब्रह्मचारिभिर्ग्राह्यो होमाग्निः (यः) निवासः (वेश्मनि) गृहे (सः) (गार्हपत्यः) अ० ५।३१।५। गृहपतिभिः संयुक्तः (यस्मिन्) जाठराग्नौ (पचन्ति) (सः) (दक्षिणाग्निः) अ० ८।१०।(१)।६। दक्षिणोऽनुकूलोऽग्नि। वानप्रस्थानां होमाग्निः ॥
