Go To Mantra

यान्यु॑लूखलमुस॒लानि॒ ग्रावा॑ण ए॒व ते ॥

Mantra Audio
Pad Path

यानि । उलूखलऽमुसलानि । ग्रावाण: । एव । ते ॥६.१५॥

Atharvaveda » Kand:9» Sukta:6» Paryayah:1» Mantra:15


Reads 45 times

PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

संन्यासी और गृहस्थ के धर्म का उपदेश।

Word-Meaning: - (यानि) जो [गृहस्थों के] (उलूखलमुसलानि) ओखली-मूसल हैं, (ते) वे [वैसे] (एव) ही [संन्यासियों के] (ग्रावाणः) शास्त्र उपदेश हैं ॥१५॥
Connotation: - जिस प्रकार गृहस्थ लोग ओखली-मूसल से कूटकर अन्न का सार निकालते हैं, उसी प्रकार संन्यासी लोग तपश्चरण करके सत्यशास्त्रों का उपदेश करते हैं ॥१५॥
Footnote: १५−(यानि) (उलूखलमुसलानि) उरु+खल चलने-अच्। उरु विस्तीर्णं खलं धान्यमर्दनस्थानं यस्य तद् उलूखलं पृषोदरादिरूपम्। उलूखलमुरुकरं वोर्क्करं वोर्ध्वखं वा-निरु० ९।२०। वृषादिभ्यश्चित्। उ० १।१०६। मुस खण्डने-कल, चित्। मुसलं मुहुः सरम्=निरु० ९।३५। धान्यादिकण्डनसाधनानि (ग्रावाणः) अ० ३।१०।५। गॄ विज्ञापे शब्दे च-क्वनिप्। शास्त्रोपदेशाः (एव) (ते) ॥