ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।
Word-Meaning: - [हे जीवात्मा !] (ऋचा) वेदवाणी से (कुम्भीम्) बटलोही को (अग्नौ अधि) अग्नि पर (श्रयामि) मैं रखता हूँ, तू (उदकम्) जल (आ सिञ्च) सींच दे, (एनम्) इस [अन्न जैसे जीवात्मा] को (अव धेहि) तू धर दे। (शमितारः) हे विचारवानो ! (अग्निना) अग्नि से [अन्न जैसे उसको] (पर्याधत्त) तुम ढक दो, (शृतः) परिपक्व [दृढ़ बुद्धिवाला] वह [वहाँ] (गच्छतु) जावे (यत्र) जहाँ (सुकृताम्) सुकर्मियों का (लोकः) दर्शनीय स्थान है ॥५॥
Connotation: - जैसे चतुर सूपकार आग पर बटलोही धर जल डालकर अन्न को आग द्वारा पकाकर उपकारी बनाता है, वैसे ही योगी जन आचार्य्य की शिक्षा से ब्रह्मचर्य आदि तप करके वेद द्वारा शान्त और परिपक्व बुद्धिवाला होकर धर्म्मात्माओं के बीच धर्म्मात्मा होता है ॥५॥