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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
आत्मा की उन्नति का उपदेश।
Word-Meaning: - [जो आचार्य] (ब्राह्मणेभ्यः) ब्राह्मणों [ब्रह्मजिज्ञासुओं] को (ऋषभम्) श्रेष्ठ परमेश्वर [के बोध] को (दत्त्वा) देकर (मनः) मन (वरीयः) अधिक विस्तृत (कृणुते) करता है। (सः) वह पुरुष (स्वे) अपने (गोष्ठे) वाचनालय में (अघ्न्यानाम्) हिंसा न करनेवालों की (पुष्टिम्) पुष्टि (अव पश्यते) देखता है ॥१९॥
Connotation: - आचार्य को योग्य है कि ब्रह्मजिज्ञासुओं को यथावत् रीति से ब्रह्मज्ञान कराके उनके लिये सुखवृद्धि करे ॥१९॥
Footnote: १९−(ब्राह्मणेभ्यः) अ० २।६।३। तदधीते तद्वेद। पा० ४।२।५९। ब्रह्मणः परमेश्वरस्याध्येतृभ्यो जिज्ञासुभ्यः (ऋषभस्य) श्रेष्ठस्य परमात्मनो बोधमित्यर्थः (दत्त्वा) (वरीयः) उरुतरम् (कृणुते) करोति (मनः) अन्तःकरणम् (पुष्टिम्) वृद्धिम् (सः) आचार्यः (अघ्न्यानाम्) म० १७। अहिंसकानां प्रजापतीनाम् (स्वे) स्वकीये (गोष्ठे) अ० २।१४।२। वाचनालये (अव पश्यते) अवलोकते ॥
