जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों का उपदेश।
Word-Meaning: - (शकमयम्) शक्तिवाले (धूमम्) कँपानेवाले [परमेश्वर] को (आरात्) समीप से (एना) इस (विषुवता) व्याप्तिवाले (अवरेण) नीचे [जीव] से (परः) परे [उत्तम] (अपश्यम्) मैंने देखा है। (वीराः) वीर लोगों ने [इसी कारण से] (उक्षाणम्) वृद्धि करनेवाले (पृश्निम्) स्पर्श करनेवाले [आत्मा] को (अपचन्त) परिपक्व [दृढ़] किया है, (तानि) वे (धर्माणि) धारण योग्य [ब्रह्मचर्य आदि धर्म] (प्रथमानि) मुख्य [प्रथम कर्तव्य] (आसन्) थे ॥२५॥
Connotation: - योगीजन सर्वशक्तिमान् सब को चेष्टा देनेवाले परमेश्वर को अल्पशक्ति जीव से अलग देखते हैं और उन्नति करते हैं जैसे वीर लोग परमात्मा के ज्ञान से अपने आत्मा को परिपक्व करके धर्म में प्रवृत्त रहते हैं ॥२५॥ इस मन्त्र का चतुर्थ पाद आ चुका है-अ० ७।५।१ ॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१।१६४।४३ ॥