जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों का उपदेश।
Word-Meaning: - (गोपाम्) भूमि वा वाणी के रक्षक, (अनिपद्यमानम्) न गिरनेवाले [अचल], (पथिभिः) ज्ञानमार्गों से (आ चरन्तम्) समीप प्राप्त होते हुए (च) और (परा) दूर प्राप्त होते हुए (च) भी [परमेश्वर] को (अपश्यम्) मैंने देखा है। (सः) वह [परमेश्वर] (सध्रीचीः) साथ मिली हुई [दिशाओं] को और (सः) वही (विषूचीः) नाना प्रकार से वर्तमान [प्रजाओं] को (वसानः) ढकता हुआ (भुवनेषु अन्तः) लोकों के भीतर (आ) अच्छे प्रकार (वरीवर्ति) निरन्तर वर्तमान है ॥११॥
Connotation: - योगी जन सर्वव्यापी अन्तर्यामी परमेश्वर को सब स्थानों में बाहिर और भीतर साक्षात् करके सदा धर्म में लगे रहते हैं ॥११॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१।१६४।३१। और १०।१७७।३। तथा यजु० ३७।१७। तथा निरुक्त १४।३ ॥