Word-Meaning: - (गायत्री) गाने योग्य [वह विराट्] (त्रिवृतम्) [सत्त्व, रज और तमोगुण−इन] तीनों के साथ वर्तमान [जीवात्मा] को (कथम्) कैसे (वि आप) व्यापी है, (त्रिष्टुप्) [कर्म, उपासना और ज्ञान इन] तीनों द्वारा पूजी गयी [मुक्ति] (पञ्चदशेन) [म० १४। पाँच प्राण, पाँच इन्द्रिय, और पञ्चभूत-इन] पन्द्रह पदार्थवाले [जीवात्मा] के साथ (कथम्) कैसे (कल्पते) समर्थ होती है। (त्रयस्त्रिंशेन) [८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, १ इन्द्र और १ प्रजापति−इन] तेंतीस [देवताओं] को अपने में रखनेवाले [परमात्मा] के साथ (कथम्) कैसे (जगती) प्राप्तियोग्य [प्रकृति, सृष्टि] और (कथम्) कैसे (अनुष्टुप्) निरन्तर स्तुतियोग्य [वेदवाणी] और (एकविंशः) [५ महाभूत, ५ प्राण, ५ ज्ञान इन्द्रिय, ५ कर्म इन्द्रिय और १ अन्तःकरण−इन] इक्कीस पदार्थोंवाला [जीवात्मा] [समर्थ होता है] ॥२०॥
Connotation: - ईश्वर की विविध शक्तियों को साक्षात् करके विज्ञानी योगीजन अपनी शक्तियाँ बढ़ाकर आनन्द पाते हैं ॥२०॥ तेंतीस देवता यह हैं−८ वसु, अर्थात् अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य द्यौः वा प्रकाश, चन्द्रमा और नक्षत्र,−११ रुद्र, अर्थात् प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनञ्जय यह दश प्राण और ग्यारहवाँ जीवात्मा,−१२ आदित्य अर्थात् महीने,−१ इन्द्र अर्थात् बिजुली−१ प्रजापति अर्थात् यज्ञ,-अथर्व० ६।१३९।१। तथा ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका पृष्ठ ६६।६८ ॥