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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
गर्भ की रक्षा का उपदेश।
Word-Meaning: - [हे रोग !] (मा सम् वृतः) तू मत घूमता रह, (मा उप सृपः) मत रींगता आ, (ऊरू अन्तरा) दोनों जाँघों के बीच (मा अव सृपः) मत सरकता जा। (अस्यै) इस [स्त्री] के लिये (दुर्णामचातनम्) दुर्नामनाशक [दुष्ट नाम रोग मिटानेवाले] (बजम्) बलवान् (भेषजम्) औषध को (कृणोमि) बनाता हूँ ॥३॥
Connotation: - वैद्य गर्भिणी स्त्री के लिये उत्तम ओषधि बनावे, जिससे उसको कोई कठिन रोग न होवे ॥३॥
Footnote: ३−(मा सम् वृतः) द्युद्भ्यो लुङि। पा० १।३।९१। इति वृतु वर्तने परस्मैपदम्, द्युतादित्वाद् अङ्। संवर्तनं मा कुरु (मोप सृपः) उपसर्पणं मा कार्षीः (ऊरू अन्तरा) अन्तरान्तरेण युक्ते। पा० २।३।४। इति द्वितीया। जानूपरिभागयोर्मध्ये (माव सृपः) अवाक् सर्पणं मा कुरु (कृणोमि) करोमि (अस्यै) गर्भिण्यै (भेषजम्) औषधम् (बजम्) वज गतौ-अच्, वस्य बः। बलकरम् (दुर्णामचातनम्) चातयतिर्नाशने-निरु० ६।३०। अतिकठिनरोगस्य विनाशकम् ॥
