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प्रप॑थे प॒थाम॑जनिष्ट पू॒षा प्रप॑थे दि॒वः प्रप॑थे पृथि॒व्याः। उ॒भे अ॒भि प्रि॒यत॑मे स॒धस्थे॒ आ च॒ परा॑ च चरति प्रजा॒नन् ॥

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Pad Path

प्रऽपथे । पथाम् । अजनिष्ट । पूषा । प्रऽपथे । दिव: । प्रऽपथे । पृथिव्या: । उभे इति । अभि । प्रियतमे इति प्रियऽतमे । सधऽस्थे इति सधऽस्थे । आ । च । परा । च । चरति । प्रऽजानन् ॥१०.१॥

Atharvaveda » Kand:7» Sukta:9» Paryayah:0» Mantra:1


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

परमेश्वर के उपासना का उपदेश।

Word-Meaning: - (पूषा) पूषा, पोषण करनेवाला परमेश्वर (पथाम्) सब मार्गों में से (प्रपथे) चौड़े मार्ग में (दिवः) सूर्य के (प्रपथे) चौड़े मार्ग में और (पृथिव्याः) पृथिवी के (प्रपथे) चौड़े मार्ग में (अजनिष्ट) प्रकट हुआ है। (प्रजानन्) बड़ा विद्वान् वह (उभे) दोनों (प्रियतमे) [परस्पर] अति प्रिय (सधस्थे) एक साथ स्थिति करनेवाले [सूर्य और पृथिवी लोक] (अभि) में (आ) हमारे निकट (च च) और (परा) दूर (चरति) विचरता रहता है ॥१॥
Connotation: - जो परमात्मा सूर्य, पृथिवी आदि लोकों को परस्पर आकर्षण से धारण करता है, वही हमारा पालन पोषण करता है, चाहे हम अपने घर के निकट वा दूर हों ॥१॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है-म० १०।१७।६ ॥
Footnote: १−(प्रपथे) प्रकृष्टे विस्तृते मार्गे (पथाम्) मार्गाणां मध्ये (अजनिष्ट) प्रादुर्भूत (पूषा) अ० १।९।१। पोषकः परमेश्वरः (दिवः) सूर्यस्य (पृथिव्याः) भूलोकस्य (उभे) द्वे द्यावापृथिव्यौ (अभि) प्रति (प्रियतमे) अतिशयेन प्रीतिमत्यौ (सधस्थे) परस्पराकर्षणेन सहस्थितिशीले (आ) समीपे (च च) (परा) दूरे (चरति) गच्छति (प्रजानन्) प्रकृष्टविद्वान् ॥