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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
सेनापति के गुणों का उपदेश।
Word-Meaning: - (सहस्य) हे बल के हितकारी ! (अग्ने) तेजस्वी सेनापति ! (पुरम्) दुर्गरूप, (विप्रम्) बुद्धिमान्, (धृषद्वर्णम्) अभयस्वभाव, (भङ्गुरावतः) नाश करनेवाले कर्म से युक्त [कपटी] के (हन्तारम्) नाश करनेवाले (त्वा) तुझको (दिवे दिवे) प्रति दिन (वयम्) हम (परि धीमहि) परिधि बनाते हैं ॥१॥
Connotation: - प्रजागण शूर वीर सेनापति पर विश्वास करके शत्रुओं के नाश करने में उससे सहायता लेवें ॥१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।८७।२२ ॥
Footnote: १−(परिधीमहि) अ० ७।१७।२। परिधिरूपेण धारयेम (त्वा) त्वाम् (अग्ने) तेजस्विन् सेनापते (पुरम्) दुर्गरूपं (वयम्) प्रजागणाः (विप्रम्) मेधाविनम् (सहस्य) अ० ४।५।१। सहसे बलाय हित (धृषद्वर्णम्) धर्षकरूपम् (दिवे दिवे) प्रति दिनम् (हन्तारम्) नाशयितारम् (भङ्गुरावतः) भञ्जभासमिदो घुरच्। पा० ३।२।१६१। भञ्जो आमर्दने-घुरच्। चजोः कु घिण्ण्यतोः पा० ७।३।५२। कुत्वम्। भञ्जनकर्मयुक्तस्य कपटिनः पुरुषस्य ॥
