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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
विष नाश का उपदेश।
Word-Meaning: - (इयम्) इस (वीरुत्) जड़ी-बूटी ने (तिरश्चिराजेः) तिरछी रेखाओंवाले, (असितात्) कृष्णवर्णवाले, (कङ्कपर्वणः) काक वा चील्ह पक्षी के समान जोड़वाले (पृदाकोः) फुसकारते हुए साँप से (सम्भृतम्) पाये हुए (तत्) उस (विषम्) विष को (परि) सब प्रकार (अनीनशत्) नाश कर दिया है ॥१॥
Connotation: - जैसे वैद्य ओषधि द्वारा सर्प आदि के विष को नाश करता है, वैसे ही विद्वान् विद्या द्वारा मानसिक दोषों का नाश करे ॥१॥
Footnote: १−(तिरश्चिराजेः) अ० ३।२७।२। तिर्यग्रेखायुक्तात् (असितात्) अ० ३।२७।१। कृष्णवर्णात् (पृदाकोः) अ० ३।२७।३। कुत्सितशब्दकारिणः सर्पात् (परि) सर्वतः (सम्भृतम्) प्राप्तम् (तत्) (कङ्कपर्वणः) ककि गतौ-अच्+पॄ पालनपूरणयोः−वनिप्। लोहपृष्ठस्तु कङ्कः स्यात्-अमर० १५।१६। कङ्कपक्षिसदृशपर्वाणि सन्धयो यस्य तस्मात् (विषम्) हलाहलम् (इयम्) (वीरुत्) ओषधिः (अनीनशत्) अ० १।२४।२। नाशितवती ॥
