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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
वेद विद्या के ग्रहण का उपदेश।
Word-Meaning: - (यत्) जिस लिये (ऋचम्) पदार्थों की स्तुतिविद्या (साम) दुःखनाशक मोक्षविद्या और (यजुः) विद्वानों के सत्कार, विद्यादान और पदार्थों के सङ्गतिकरण द्वारा (हविः) ग्राह्यकर्म, (ओजः) मानसिक बल और (बलम्) शारीरिक बल को (अप्राक्षम्) मैंने पूँछा है [विचारा है]। (तस्मात्) इसलिये, (शचीपते) हे वाणी वा कर्म वा बुद्धि के रक्षक आचार्य ! (एषः) यह (पृष्टः) पूछा हुआ (वेदः) वेद (मा) मुझको (मा हिंसीत्) न दुःख देवे ॥२॥
Connotation: - मनुष्य विचारपूर्वक वेदों का अध्ययन करके उत्तम कर्म से मानसिक और शारीरिक बल बढ़ाकर आनन्दित होवें ॥२॥
Footnote: २−(ऋचम्) म० १। पदार्थस्तुतिविद्याम् (साम) म० १। दुःखनाशिकां मोक्षविद्याम् (यत्) यस्मात्कारणात् (अप्राक्षम्) प्रच्छ ज्ञीप्सायाम्-लुङ्, द्विकर्मकः। प्रश्नेन विचारितवानस्मि (हविः) ग्राह्यं कर्म (ओजः) मानसं बलम् (यजुः) अर्तिपॄवपियजि०। उ० २।११७। इति यज देवपूजासङ्गतिकरणदानेषु-उसि। यजुर्यजतेः-निरु० ७।१२। विदुषां सत्कारं विद्यादानं पदार्थसङ्गतिकरणं च (बलम्) शरीरबलम् (एषः) प्रसिद्धः (मा हिंसीत्) मा दुःखयेत् (तस्मात्) कारणात् (मा) माम् (वेदः) अ० ७।२८।१। ईश्वरोक्तज्ञानम् (पृष्टः) विचारितः। अधीतः (शचीपते) शची=वाक्-निघ० १।११। कर्मः−२।१। प्रज्ञा ३।९। हे वाचः कर्मणः प्रज्ञायाः पालक ॥
