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सिनी॑वालि॒ पृथु॑ष्टुके॒ या दे॒वाना॒मसि॒ स्वसा॑। जु॒षस्व॑ ह॒व्यमाहु॑तं प्र॒जां दे॑वि दिदिड्ढि नः ॥

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Pad Path

सिनीवालि । पृथुऽस्तुके । या । देवानाम् । असि । स्वसा । जुषस्व । हव्यम् । आऽहुतम् । प्रऽजाम् । देव‍ि । दिद‍िड्ढि । न: ॥४८.१॥

Atharvaveda » Kand:7» Sukta:46» Paryayah:0» Mantra:1


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

स्त्रियों के गुणों का उपदेश।

Word-Meaning: - (पृथुष्टुके) हे बहुत स्तुतिवाली ! (सिनीवालि) अन्नवाली [वा प्रेमयुक्त बल करनेवाली] गृहपत्नी ! (या) जो तू (देवानाम्) दिव्यगुणों की (स्वसा) अच्छे प्रकार प्रकाश करनेवाली वा ग्रहण करनेवाली (असि) है, सो तू (हव्यम्) ग्रहण करने योग्य, (आहुतम्) सब प्रकार स्वीकार किये व्यवहार का (जुषस्व) सेवन कर और (देवि) हे कामनायोग्य देवी ! (नः) हमारे लिये (प्रजाम्) सन्तान (दिदिड्ढि) दे ॥१॥
Connotation: - जिस घर में अन्नवती, सुशिक्षित, व्यवहारकुशल स्त्रियाँ होती हैं, वहीं उत्तम सन्तान उत्पन्न होते हैं ॥१॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है-२।३२।६। और यजुर्वेद−३४।१०। तथा-निरु० ११।३२। में व्याख्यात है ॥
Footnote: १−(सिनीवालि) अ० २।२६।२। षिञ् बन्धने-नक्, ङीप्+बल जीवने दाने च-अण्, ङीप्। हे अन्नवति-निरु० ११।३१। यद्वा सिनी प्रेमबद्धा चासौ बलकारिणी च तत्सम्बुद्धौ (पृथुष्टुके) सृवृभूशुषिमुषिभ्यः कक्। उ० ३।४१। इति ष्टुञ् स्तुतौ-कक्। बहुस्तुतियुक्ते (या) (देवानाम्) दिव्यगुणानाम् (असि) भवसि (स्वसा) अ० ५।५।१। सु+अस दीप्तौ ग्रहणे च−ऋन्। सुष्ठु दीपयित्री ग्रहीत्री वा (जुषस्व) सेवस्व (हव्यम्) ग्राह्यम् (आहुतम्) समन्तात् स्वीकृतं व्यवहारम् (प्रजाम्) सुसन्तानरूपाम् (देवि) कमनीये विदुषि (दिदिड्ढि) दिश दाने-लोटि, शपः श्लु। दिश। देहि (नः) अस्मभ्यम् ॥