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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
राजा और प्रजा के कर्म का उपदेश।
Word-Meaning: - (नमः) वज्र को (बिभ्रतः) धारण करते हुए [पुरुषार्थ करते हुए] हम लोग (प्रियम्) प्रीति करनेवाले, (पनिप्नतम्) अत्यन्त व्यवहारकुशल, (युवानम्) पदार्थों के संयोग-वियोग करनेवाले वा बलवान्, (आहुतीवृधम्) यथावत् देने लेने योग्य क्रिया के बढ़ानेवाले राजा को (उप अगन्म) प्राप्त हुए हैं, वह (मे) मेरी (आयुः) आयु को (दीर्घम्) दीर्घ (कृणोतु) करे ॥१॥
Connotation: - जिस प्रकार नीतिकुशल, प्रतापी राजा अनेक विद्याओं के दान से प्रजा की रक्षा करे, उसी प्रकार प्रजा भी उसके उपकारों को सन्मानपूर्वक ग्रहण करे ॥१॥
Footnote: १−(उप) पूजायाम् (प्रियम्) प्रीतिकरम् (पनिप्नतम्) पन व्यवहारे स्तुतौ च यङ्लुकि शतृ। दाधर्तिदर्धर्ति०। पा० ७।४।६५। इति सूत्र इतिकरणस्य प्रदर्शनादत्राभ्यासस्य निगागम उपधालोपश्च। अत्यन्तं व्यवहारकुशलम् (युवानम्) पदार्थानां संयोजकवियोजकं बलवन्तं वा (आहुतीवृधम्) यथावद् दातव्यग्राह्यक्रियावर्धकम् (अगन्म) वयं प्राप्तवन्तः (बिभ्रतः) धारयन्तः (नमः) वज्रम्-निघ० २।२०। (दीर्घम्) चिरम् (आयुः) जीवनम् (कृणोतु) करोतु (मे) मम ॥
