Go To Mantra
Viewed 124 times

दि॒वो वि॑ष्ण उ॒त वा॑ पृ॑थि॒व्या म॒हो वि॑ष्ण उ॒रोर॒न्तरि॑क्षात्। हस्तौ॑ पृणस्व ब॒हुभि॑र्वस॒व्यैरा॒प्रय॑च्छ॒ दक्षि॑णा॒दोत स॒व्यात् ॥

Mantra Audio
Pad Path

दिव: । विष्णो इति । उत । वा । पृथिव्या: । मह: । विष्णो इति । उरो: । अन्तरिक्षात् । हस्तौ । पृणस्व । बहुऽभि: । वसव्यै: । आऽप्रयच्छ । दक्षिणात् । आ । उत । सव्यात् ॥२७.८॥

Atharvaveda » Kand:7» Sukta:26» Paryayah:0» Mantra:8


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

व्यापक ईश्वर के गुणों का उपदेश।

Word-Meaning: - (विष्णो) हे सर्वव्यापक विष्णु ! (दिवः) सूर्य लोक से (उत) और (पृथिव्याः) पृथिवी लोक से, (वा) अथवा, (विष्णो) हे विष्णु ! (महः) बड़े (उरोः) चौड़े (अन्तरिक्षात्) अन्तरिक्ष लोक से (बहुभिः) बहुत से (वसव्यैः) धनसमूहों से (हस्तौ) दोनों हाथों को (पृणस्व) भर (उत) और (दक्षिणात्) दाहिने (उत) और (सव्यात्) बायें हाथ से (आप्रयच्छ) अच्छे प्रकार से दान कर ॥८॥
Connotation: - मनुष्य परमेश्वररचित सूर्य, पृथिवी, अन्तरिक्ष आदि लोक-लोकान्तर और सब पदार्थों से विज्ञानपूर्वक उपकार लेकर धन आदि की प्राप्ति से आनन्द भोगें ॥८॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजु० में है−५।१९ ॥
Footnote: ८−(दिवः) प्रकाशमानात् सूर्यात् (विष्णो) हे सर्वव्यापक ! (उत) अपि (वा) अथवा (पृथिव्याः) भूलोकात् (महः) मह-क्विप्। विशालात् (उरोः) उरुणः। विस्तीर्णात् (अन्तरिक्षात्) आकाशात् (हस्तौ) करौ (पृणस्व) पूरय (बहुभिः) अधिकैः (वसव्यैः) वसोः समूहे च। पा० ४।४।१४०। वसु-यत्। वसूनां धनानां समूहैः (आप्रयच्छ) समन्ताद् देहि (दक्षिणात्) दक्षिणहस्तात् (आ) चार्थे (उत) अपि (सव्यात्) वामहस्तात् ॥