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यस्ये॒दं प्र॒दिशि॒ यद्वि॒रोच॑ते॒ प्र चान॑ति॒ वि च॒ चष्टे॒ शची॑भिः। पु॒रा दे॒वस्य॒ धर्म॑णा॒ सहो॑भि॒र्विष्णु॑मग॒न्वरु॑णं पू॒र्वहू॑तिः ॥

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Pad Path

यस्य । इदम् । प्रऽदिशि । यत् । विऽरोचते । प्र । च । अनति । वि । च । चष्टे । शचीभि: । पुरा । देवस्य । धर्मणा । सह:ऽभ‍ि: । विष्णुम् । अगन् । वरुणम् । पूर्वऽहूति: ॥२६.२॥

Atharvaveda » Kand:7» Sukta:25» Paryayah:0» Mantra:2


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

राजा और मन्त्री के धर्म का उपदेश।

Word-Meaning: - (यस्य) जिन (देवस्य) व्यवहारकुशल [राजा और मन्त्री] के (प्रदिशि) अच्छे शासन में (धर्म्मणा) उनके धर्म अर्थात् नीति और (सहोभिः) पराक्रम से (इदम्) यह [राज्य] है, (यत्) जो कुछ (पुरा) हमारे सन्मुख (शचीभिः) अपने कर्मों से (विरोचते) जगमगाता है, (च) और (प्र अनति) श्वास लेता है (च) और (वि चष्टे) निहारता है, [उन दोनों] (विष्णुम्) व्यापनशील राजा और (वरुणम्) श्रेष्ठ मन्त्री को (पूर्वहूतिः) सबका आवाहन (अगन्) पहुँचा है ॥२॥
Connotation: - जहाँ राजा और मन्त्री के सुप्रबन्ध से प्रजा के सब स्थावर और जङ्गम पदार्थ सुरक्षित रहते हैं, वहाँ सब लोग प्रसन्न रह कर उस राज्य की प्रशंसा करते हैं ॥२॥
Footnote: २−(यस्य) सुपां सुपो भवन्ति। वा० पा० ७।१।३९। अत्र द्विवचनस्यैकवचनम्। ययोः (इदम्) राज्यम् (प्रदिशि) अनुशासने (यत्) विश्वम् (विरोचते) विविधं दीप्यते (प्र) प्रकर्षेण (च) (अनति) अनिति। श्वसिति (च) (वि) विविधम् (च) (वि) विविधम् (चष्टे) पश्यति (शचीभिः) कर्मभिः-निघ० १।२। (पुरा) अस्माकं निकटे (देवस्य) व्यवहारकुशलयोः (धर्मणा) धारणसामर्थ्येन (सहोभिः) पराक्रमैः। अन्यत्पूर्ववत्-म० १ ॥