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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
परस्पर दुःख नाश का उपदेश।
Word-Meaning: - (सूर्यस्य) सूर्य की (सप्त) सात [वा नित्य मिली हुई] (रश्मयः) किरण (दिवः) आकाश से (समुद्रियाः) अन्तरिक्ष में रहनेवाले (धाराः) धारारूप (आपः) जलों को (अव तारयन्ति) उतारती हैं, (ताः) उन्होंने (ते) तेरी (शल्यम्) कील [क्लेश] को (असिस्रसन्) बहा दिया है ॥१॥
Connotation: - जैसे सूर्य की किरणें जल बरसा कर दुर्भिक्ष आदि पीड़ायें दूर करती हैं, वैसे ही मनुष्य परस्पर दुःख नाश करें ॥१॥
Footnote: १−(दिवः) आकाशात् (अवतारयन्ति) अवपातयन्ति (सप्त) अ० ४।६।२। सप्तसंख्याकाः। समवेताः (सूर्यस्य) आदित्यस्य (रश्मयः) व्यापकाः किरणाः (आपः) द्वितीयार्थे प्रथमा। अपः। जलानि (समुद्रियाः) अ० ७।७।१। अन्तरिक्षे भवाः (धाराः) प्रवाहरूपाः (ताः) (आपः) (ते) तव (शल्यम्) अ० २।३०।३। वाणाग्रभागम्। क्लेशमित्यर्थः। (असिस्रसन्) स्रंसु गतौ, ण्यन्ताल्लुङि चङि। अनिदितां हल० पा० ६।४।२४। उपधानकारलोपः। सन्वल्लघुनि०। पा० ७।४।९३। इति सन्वद्भावात्। सन्यतः। पा० ७।४।७९। अभ्यासस्य इत्वम्। निवारितवत्यः ॥
