PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
क्रोध की शान्ति के लिये उपदेश।
Word-Meaning: - [हे मनुष्य !] (ते) तेरे (हृदः) हृदय से (मन्युम्) क्रोध को (अव तनोमि) मैं उतारता हूँ, (इव) जैसे (धन्वनः) धनुष से (ज्याम्) डोरी को। (यथा) जिस से (समनसौ) एकमन (भूत्वा) होकर (सखायौ इव) दो मित्रों के समान (सचावहै) हम दोनों मिले रहें ॥१॥
Connotation: - मनुष्यों को ईर्ष्या द्वेष छोड़कर सदा मित्र होकर रहना चाहिये ॥१॥
Footnote: १−(ज्याम्) अ० १।१।३। मौर्वीम् (इव) यथा (धन्वनः) धनुषः (मन्युम्) क्रोधम् (अव तनोमि) अवरोपयामि। अवतरामि (ते) तव (हृदः) हृदयात् (यथा) येन प्रकारेण (संमनसौ) समानमनस्कौ परस्परानुरागिणौ (भूत्वा) (सखायौ) सुहृदौ (सचावहै) षच समवाये−लोट्। समवेतौ नित्यसंगतौ भवाव ॥
