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यो विश्वा॒भि वि॒पश्य॑ति॒ भुव॑ना॒ सं च॒ पश्य॑ति। स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॑ ॥

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Pad Path

य: । विश्वा । अभि । विऽपश्यति । भुवना । सम् । च । पश्यति । स: । न: । पर्षत् । अति। द्विष: ॥३४.४॥

Atharvaveda » Kand:6» Sukta:34» Paryayah:0» Mantra:4


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

शत्रुओं के नाश का उपदेश।

Word-Meaning: - (यः) जो परमेश्वर (विश्वा) सब (भुवना) भुवनों को (अभि) चारों ओर से (विपश्यति) अलग-अलग देखता है (च) और (सम् पश्यति) मिले हुए देखता है। (सः) वह (द्विषः) वैरियों को (अति) उलाँघ कर (नः) हमें (पर्षत्) भरपूर करे ॥४॥
Connotation: - परमेश्वर सब लोकों और पदार्थों को व्यस्त और समस्त रूप से देखकर उनकी सुधि रखता है ॥४॥
Footnote: ४−(यः) परमेश्वरः (विश्वा) सर्वाणि (अभि) सर्वतः (विपश्यति) पृथक् पृथगवलोकयति (भुवना) भुवनानि (च) (सम् पश्यति) संगतानि निरीक्षते ॥